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श्रम विभाग बाल मजदूरी को लेकर फाइलों तक सीमित,जमीनी हकीकत कुछ और, पेट के लिये बच्चें करते है मजदूरी-सावित्री देवी

श्रम विभाग बाल मजदूरी को लेकर फाइलों तक सीमित,जमीनी हकीकत कुछ और, पेट के लिये बच्चें करते है मजदूरी-सावित्री देवी



प्रभा पांडेय


लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया 


सोनभद्र।महिला सुरक्षा एवं जन सेवा ट्रस्ट की अध्यक्ष सावित्री देवी ने कहा कि बाल श्रमिकों का है अधिकार, रोटी-खेल-पढ़ाई प्यार, शिक्षा का प्रबंध करो, बाल मजदूरी बंद करो’ ये नारे श्रम विभाग के फाइलों में ही दम तोड़ रही है और सोनभद्र जिले में श्रम विभाग के नाक के नीचे जमकर बाल मजदूरी कराया जा रहा है।शहर के चाय-नाश्ते की दुकान से लेकर होटल व फुटपाथ के चाय नास्ते की दुकान पर भी बच्चे देर रात तक काम करते हैं साथ ही कुछ जगहों पर मनरेगा में व शादी विवाह के अवसरों पर रोड लाईट उठाते या बर्तन धोते,गाड़ी चलाते नजर आते है ।



जिम्मेदार श्रम विभाग के अधिकारी इन बच्चों को न्याय दिलाने के बजाय खुद बिना पैसे के खाने में लगे रहते हैं। खाने-खेलने की उम्र में काम करना या काम कराना दोनों अपराध है।चाहे वह बड़े दुकान की बात हो या होटलों व फुटपाथी दुकानों की शहर के सभी दुकानों व होटलों में बाल मजदूर खुले रूप से काम करते हैं करें भी क्यों नहीं, आखिर पापी पेट का सवाल है। कोई अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए बाल मजदूरी कर रहा है तो कोई अपने बूढ़े मा-बाप की दवाई के लिए निश्चित रूप से बच्चों से बचपन छीनता जा रहा लेकिन इसके लिए जिस विभाग को सरकार ने जिम्मेदार बनाया है वह खुद बच्चों के बचपन को बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता। अलबत्ता उसे नियोक्ता द्वारा चांदी के कुछ सिक्के मिलते रहने चाहिए कौन है बाल मजदूर बाल मजदूर का मतलब 14 वर्ष के कम उम्र के बच्चे जो छोटे-छोटे फुटपाथी दुकानों एवं होटलों में काम करते हैं जिन्हें अपने भविष्य के बारे में पता ही नहीं कि क्या होगा कॉपी-किताब की जगह हाथ में झाड़ू-पोछा के कपड़े व जूठा प्लेट में अपनी जिंदगी सवार रहे हैं गरीब तबके के हैं बाल मजदूर बाल श्रम करने वाले जितने भी मजदूर हैं सभी गरीब तबके के हैं. जिसके मां-बाप काम करने में असमर्थ हैं या खुद गलत आदतों से ग्रसित है कुछ ऐसे भी बच्चे हैं जो अनाथ हैं और उसकी परवरिश उसी होटल मालिकों एवं दुकान के मालिकों द्वारा किया जाता है ऐसे में बच्चे काम नहीं करेंगे तो उनकी जिंदगी का गुजारा मुश्किल हो जायेगा। चाय-नाश्ते की दुकान में सिमटी है जिंदगी हंसने-खेलने के उम्र में बच्चे अपने भविष्य में बारे में जानते भी नहीं कि आने वाले समय में क्या होगा वे तो सिर्फ इतना जानते हैं कि काम करेंगे तो कुछ पैसा और खाना मिलेगा यही कारण है कि छोटे-छोटे बालक होटल, गैराज, साइकिल दुकान व फुटपाथ पर लगने वाले नाश्ते की दुकानों पर काम करते देखे जा सकते हैं नियमों की उड़ रही धज्जियां शहर के विभिन्न प्रतिष्ठानों में 14 वर्ष के कम उम्र के बच्चों से काम लिया जा रहा है. चाहे वह साइकिल की दुकान हो या होटल की कम पैसे देकर इस तरह के बच्चों से काम लिया जा रहा है. जिसे दो वक्त की रोटी के साथ 500-1000 रुपये थमा दिया जाता है।इस तरह के समस्याओं के लिये सरकार सर्वप्रथम ग्राम पंचायत/नगर पंचायत/ब्लाक/तहसील स्तर पर सामाजिक संगठनों का सहयोग लेते हुये एक क्षेत्रीय सूची इस तरह के बच्चों का बना कर उनकी समस्याओं को समझ उस पर संबंधित विभाग जिला प्रशासन से बैठ कर विचार विमर्श कर उचित जनहित समाजहित उस मजबूर बच्चे के हित मे कोई प्रभावी कदम उठाना पड़ेगा जिससे किसी का कोई नुकसान न हो।


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