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हरी खाद का जैविक खेती में उपयोग एवं महत्व 

हरी खाद का जैविक खेती में उपयोग एवं महत्व 



डा प्रकाश यादव  
कृषि महाविद्यालय आजमगढ़


लोकल न्यूज ऑफ इंडिया 
वर्तमान समय में खेती का यंत्रीकरण होने के कारण पशुपालन कम हो रहा है जिससे गोबर की खाद एवं कम्पोस्ट जैसे कार्बनिक स्रोतों की सीमित आपूर्ति के कारण हरी खाद का प्रयोग करके ही मृदा उर्वरकता एवं उत्पादकता में टिकाऊपन लाया जा सकता है । सघन कृषि पद्धति तथा अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग के कारण वर्तमान में मृदा में पोषक तत्वों की कमी आ रही है इस कारण आज उत्पादन व मृदा स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आ रही है और उपजाऊ भूमि बंजर भूमि परिवर्तित हो रही है। अतः जैविक पदार्थो के उपयोग से ही इन दुष्प्रभावों से बच जा सकता है।



हरी खाद किसे कहते है
हरे पौधों को उनके वानस्पतिक वृद्धि काल में उपयुक्त समय पर जुताई करके मृदा में दबा देना तथा इस पर हरे पदार्थ से सड़ने के बाद भूमि को पोषक तत्व प्रदान करने को हरी खाद कहते है।
खाद का मतलब उन पत्तीदार फसलों से है जिनकी वृद्धि शीघ्र व काफी मात्रा में हो। फसल के बड़ी होने पर फूल आने से पहले ही उन्हें जोतकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। यह फसलें मिट्टी में जीवाणुओं से विच्छेदित होकर पौधों के पोषक तत्वों की मात्रा में वृद्धि करती है। शस्य प्रणाली में इसे “हरी खाद देना”
हरी खाद देने के तरीके
हरी खाद देने के मुख्यतया दो तरीके है जो कि मृदा जलवायु एवं पानी की उपलब्धता पर निर्भर करते है।



हरी खाद की स्थानीय विधि
इस विधि में हरी खाद की फसल को उसी खेत में उगाया जाता है जिसमे  हरी खाद देनी है। हरी खाद की फसल का शुद्ध अथवा मिश्रित रूप में मुख्य फसल के साथ उगाते है। फसल को उचित समय में खेत में जोत देते है। इस विधि में सनई, ढैंचा, ग्वार, उड़द, मूँग, लोबिया, बरसीम, लूसर्न, सैंजी आदि फसलों को उगाया जाता है।


हरी पत्तियों की खाद
इस विधि में विशेष कारणवश जब हरी खाद की फसल को उसी खेत में नहीं उगाया जा सकता है तो उसे अन्य खेत में उगाकर फिर उचित समय पर काटकर अन्य खेत में बिखेरकर मिट्टी पलटने वाले हल से मिला दिया जाता है।
 
हरी खाद की फसल के आवश्यक गुण
• शीघ्र व अधिक बढ़वार वाली फसल होनी चाहिए।
• फसल खूब पत्तियों व शाखाओं वाली होनी चाहिए ताकि अधिक कार्बनिक पदार्थ मिट्टी में मिलाया जा सके।
• फसल की पत्तियाँ व शाखाएँ मुलायम हो ताकि शीघ्र मिट्टी में सड़ सके।
• इसकी फसल यदि फलीदार हो तो अधिक अच्छा है। क्योंकि फलीदार फसल की जड़ों में स्थित गांठों में सहजीवी वायुमंडल की नत्रजन को मृदा में स्थिर करते है। 
• सस्ते और आसानी से मिलने वाले बीज की फसल बोनी चाहिए।
• फसल की जड़ नीचे गहरी जाने वाली हो ताकि मिट्टी भुरभुरी बना सके तथा नीचे के पोषक तत्वों को ऊपर ले आये।कम उपजाऊ भूमि पर भी आसानी से उगाई जा सके।फसल कीट व रोग रोधी हो।
• फसल चक्र में हरी खाद वाली फसल का उचित स्थान हो।फसल को कम तैयारी, प्रबंधन व कम देखरेख की आवश्यकता हो।
• प्रतिकूल जलवायु परीस्थिति को सहन कर सके। फसल को बढ़वार के लिए खाद-उर्वरकों की आवश्यकता न हो। 
• फसल मिट्टी में विघटन पश्चात् अधिक उपयोगी अवशेष छोड़े।हरी खाद के साथ-साथ फसल के अन्य उपयोग भी हो
हरी खाद में बरतें सावधानियां 
• हरी खाद 45-60 दिनों के अंदर खेत में जरूर मिला दें। 
• खेत में हरी खाद वाली फसलों को पलटते समय भरपूर नमी बनाए रखें। 
• हरी खाद की फसलों को हलकी बलुई मिट्टी में अधिक गहराई पर और भारी मिट्टी में कम गहराई पर दबाना चाहिए।
• हरी खाद वाली फसलों को सूखे मौसम में ज्यादा गहराई पर पर नम मौसम में कम गहराई पर दबाना चाहिए। हरी खाद वाली फसलों को खेत में मिलाने के लिए फूल आने से पहले की अवस्था सब से अच्छी होती है। स्थानीय जलवायु व हालात के मुताबिक हरी खाद की फसलों की बिजाई करनी चाहिए।


 


 


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