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किसानो से खेलती सरकार या किसान संगठन 

किसानो से खेलती सरकार या किसान संगठन 


 


विजय शुक्ल 


लोकल न्यूज ऑफ इंडिया 


दिल्ली। किसान मन उदास भी है और सड़क पर भी हैं गुस्से में , अपने हक़ की अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए।  पर दूसरी तरफ दशक के सबसे कम न्यूनतम सरकारी खरीद मूल्य में  बढ़ोत्तरी की भीख देकर सरकार यह कोशिश कर रही है कि  किसानो को पटा  लिया जाएगा। वो भी तब जब सांसद धरने पर हैं और उनको हरिवंश जी चाय की चुस्की से और चिढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।  मानो जैसे गांधी जी का ही उपहास उड़ाने का खेल चल रहा हो। 


हालांकि टुकड़े टुकड़े गैंग से निपटती सरकार ड्रग्स और सुशांत पर जितनी गंभीरता से राष्ट्र प्रेम में जांच और कार्रवाई कर रही हैं और उन सबको एक विशेष संस्था के द्वारा किसी ना किसी बहाने जेएनयू मामले में उनके बोलने की सजा देने के मूड में हैं काश वैसे ही कुछ किसानो को लेकर होती तो अच्छा होता। 


दरअसल सरकार किसानो का सब कुछ छीनते  हुए उनको बहुत कुछ देने का दिखावा कर रही हैं।  महज ६ प्रतिशत किसान अपना अनाज न्यूनतम मूल्य (एमएसपी ) पर बेच पाते हैं और उसमे बड़े किसान शामिल हैं ना कि  छोटे छोटे काश्तकार।  बिचौलियों को ख़त्म करने के चक्कर में सरकार बड़े डीलर्स लाना चाहती हैं बस नाम का फर्क हैं कि  कबाड़ी सुनने में थोड़ा बुरा लगता हैं तो उसको स्क्रैप डीलर बोलना शुरू कर दे।  


आढ़तिये या तथाकथित बिचौलियों के कमीशन का ही सिर्फ खेल होता तो समझ आता पर जो आपातकालीन स्तिथियो को छोड़कर बाकी स्तिथियो में गेंहू , चावल, दाल आदि का जितना चाहे उतना भंडारण वाला मामला हैं वो कही ना कही आने वाले समय में किसानो के बजाय मिडिल क्लास परिवार की बैंड बजाने वाला हैं जो आने वाले वक़्त में आपको पता चल जाएगा। 


और हाँ यह जो बिल पास करवाने का नाटक हैं अब शायद जनता को समझ में आ गया हैं की अपने सहयोगियों से विरोध करवाकर उनके वोटर्स को बचाते हुए संसद की बजाय सड़क पर विरोध दिखा अपना उल्लू सीधा करने का काण्ड सरकार करती आ रही हैं साफ़ दिखता  हैं। 


बहरहाल चुनाव की बात छोड़ दे तो अगर किसानो के फायदे और नफे नुकसान की बात सरकार कर रही हैं तो क्यों ना न्यूनतम मूल्य पर सबको खरीदने का प्रावधान कर दे।  अगर ऐसा हुआ तो आढ़तिये भी खुश किसान भी खुश और सबका फायदा ही फायदा। 


सरकार को बहाने की बजाय लड़ने का रुख और सब कुछ सही करने का पूरा हक़ हैं जरूरी नहीं है कि  सत्तर साल के मोदी जी भी सत्तर साल की विरासत को जो देश प्रेम से हम सबको दूर रख रही थी उसको जारी रखे।  पर एक बात खासकर उनको भी गाँठ बाँध लेनी होगी की उन्होंने जितना अभी अब तक कहा हैं देने का वो देने की बजाय लिया यही हैं सिवाय ३७० और राम मंदिर के।  


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