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वेतन तो शिक्षक का कटेगा भले ही वो महिला हो और महिला अवकाश का दिन हो , खंड शिक्षा अधिकारी पर तो जांच जारी है ही ,पर यक्ष प्रश्न आखिर कब तक  



  • महिला अवकाश के दिन महिलाओ का वेतन काटना तो याद है , पर बीएसए साहब को डीएम साहब के आदेश को स्पष्ट करना याद नहीं - शीतल दहलान , जिला अध्यक्ष , प्राथमिक शिक्षक संघ 

  • सिस्टम ही तो है वरना जिस स्कूल में छः और आठ महीने से कोई शिक्षक नहीं आ रहा वहा साहब लोग जाने की जरूरत नहीं समझते  , पर महिला हूँ चीख चिल्ला ही सकती हूँ , पर हूँ तो निरीह ना - शीतल दहलान 


विजय शुक्ल


लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया


दिल्ली।  खनन ,और शिक्षा दो ही ऐसे माफिया है जो आज सोनभद्र को दीमक की तरह खोखला कर रहे है, वो भी भ्रष्ट और सरपरस्ती में जी रहे अधिकारियो की कृपा से। बहरहाल लोकल न्यूज ऑफ इंडिया और कई समझदार लोग शायद शिक्षक पद की गरिमा को लेकर सोनभद्र में चिंतित नजर आते है।  



चाहे म्योरपुर खंड शिक्षा अधिकारी को लेकर बेबाक और स्पष्ट वादी विधायक हरीराम चेरो का बयान हो कि  सहाय बदमाश आदमी है  या फिर ऑडियो में पैसे का आरोप लगाने वाली महिला शिक्षिका का अब भी दबाव में जीना और सिस्टम से लगातार जूझना जो जांच की छुरछुरछुरिया के साथ आरोपी खंड शिक्षा अधिकारी को अपने रसूख और दबाव का खेल घूम घूम कर साबित करने की इजाजत देता हो।  जो  जिलाधिकारी महोदय से हमारे द्वारा पूछे गए सवाल पर उनके जबाब से झलकता है कि  जांच जारी है और यह विभाग का मन है की वो क्या करेगा ?


आपको बता दे कि  जिलाधिकारी महोदय के आदेश पर सीओ दुद्धी जांच अधिकारी के बतौर इस पर अपने रिपोर्ट या आख्या शायद अब तक डीएम साहब के सुपुर्द कर भी चुके हो क्योकि यह तो विभागीय गोपनीयता के तहत आने वाला काम है।  पर जनता और शिक्षकों के बीच विश्वास बनाये रखने के लिए जरूरी हैं त्वरित कार्रवाई।  पर ना जाने क्यों स्कूली बच्चो की वर्दी के खरीद  फरोख्त की भारी भरकम जिम्मेदारी के कारण शायद विभाग यानी बीएसए साहब आज तक म्योरपुर खंड शिक्षा अधिकारी को अब तक कोई कार्रवाई ना कर पाने के लिए मजबूर हो जबकि औचक निरीक्षण कर शिक्षकों का वेतन तो लटकाने का बिलकुल झन्नाटे दार काम साहब ने कर दिखाया और शायद यह सोनभद्र के शिक्षकों के लिए एक चेतावनी भी मान ले कि अधिकारियों के खिलाफ पंगा न ले तो  ही बेहतर।   सिस्टम है सिस्टम के तहत चले। 




अब तक तो श्रुतिदेव तिवारी जी का मामला भी लगभग रफा दफा हो चुका है, अरे वही जो आठ महीने बाद साहब की कृपा बरसने के कारण वापस महमड़ स्कूल में आ गए जिसका नाम कोरोना के लॉक डाउन में मेमोरी लॉक होने के कारण वो बताना भूल गए थे जी थोड़ा सा डायरेक्शन की कमी के कारण।  


बहरहाल अब हजार किलोमीटर दूर बैठकर रोजाना मैं भी इसमें क्या कर सकता हूँ जब पंचायत, विधायक , बीएसए और जिलाधिकारी के लिए यह सोचने का विषय ही  नहीं है। इन्ही सबको लेकर मैंने प्राथमिक शिक्षक संघ के एक धड़े की जिलाध्यक्ष शीतल दहलान से बात की तो मानो उनका दर्द उनके ही शब्दों से निकल आया कि  जिलाधिकारी महोदय के शासनादेश पर मार्गदर्शन करने का वक़्त तो बीएसए साहब के पास नहीं था पर महिला अवकाश के दिन महिलाओ के विद्यालय जाकर उनका वेतन काटने का आदेश तुरंत जारी करने का पूरा मौक़ा उनके पास था।  मैं एक महिला हूँ अगर वो चाहे तो मेरे स्कूल आकर मेरे रजिस्टर पर लाल पीला जो भी चाहे सब कर सकते है और मैं सिर्फ चीख चिल्ला सकती हूँ पर कर कुछ नहीं सकती।  



अब आप सोचिये एक तेज तर्रार शिक्षकों के हक़ की बात उठाने वाली यह महिला शिक्षिका इतनी मजबूर हैं तो जिस ऑडियो में पैसे का आरोप लगाने वाली महिला ने अपने अधिकारी के खिलाफ तंग आकर उसकी आवाज सबके सामने लाने का फैसला किया होगा वो कितनी मजबूर होगी या उस पर कितना दबाव होगा। और आज उसकी मानसिक हालत कैसी होगी जब जांच के दायरे में फंसा आरोपी अधिकारी स्कूल स्कूल खेल रहा है और मीडिया मन्त्र बाटने वाले गुरुवो की सरपरस्ती के साथ मौज ले रहा है। शायद सच में वो बीएसए , डीएम से ऊपर गवर्नर तक की पहुंच रखता  हैं।   वरना क्या मजाल की जांच की गति इतनी धीमी हो कि  इसका रिजल्ट आने का इन्तजार करते लोग खुद भगवान् को प्यारे हो जाय क्योकि यह सब तो विभाग की मर्जी से होगा और उनकी मर्जी अब तक तो दिख ही  रही है। 


आप यकीन मानिये मैं दिल्ली में बैठा सोनभद्र के प्राथमिक शिक्षा के आकड़ो की धमक अव्वल देख जितना खुश हुआ था आज मुझे उतना ही अफ़सोस इस अफसरशाही व जांच के लेट लतीफी को लेकर हो रहा है. और शर्म से सर झुक जा रहा है मेरा। जब एक महिला जिसको अपने सम्मान की सबसे ज्यादा फिक्र होती है वो न्याय के लिए गुहार लगाती है और वो रोजाना जांच के खेल में कुढ़ कुढ़ कर उसी अधिकारी को झेल रही है ।  अभी ज़रा सोचिये जब वो महिलाये जो साहब लोगो के सिस्टम से दो तीन साल से कही गायब है, पैदा होगी सवालों के घेरे में तब यह अधिकारी क्या करेंगे ? 



उम्मीद हैं ईमानदार डीएम , विद्वान् बीएसए  और कर्म प्रधान सीओ की जांच में कुछ तो न्याय होगा।  और सोनभद्र की धरती पर थोड़े से विश्वास की बयार शिक्षकों के दिल में भी बहेगी,  खासकर उनके जो रोजाना अपने समय पर शिक्षक होने का फर्ज निभा रहे है।   वरना बाकी तो जानते है ही की क्या रेट हैं गैरहाजिर होने का, वो भी घंटो के लिए नहीं ,दिनों के लिए नहीं, महीनो और सालो के लिए।  यह बस यकीन मानिये योग्य लोगो के अधिकारों और हम सब के टैक्स पर जा रही सैलरी का वैसा ही खनन का चोखा धंधा है जैसा ओबरा के व्यवसायी किसी और की जमीन पर बिना हेलमेट , बिना इंश्योरेंस और बिना किसी डर के मीडिया के कुछ व्यवसायिक सोच के लोगो के सहारे सब कुछ मैनेज कर रहे है।



मेरी आवाज और मेरी मौजूदगी मेरे युवा साथी सूर्यमणि के आकस्मिक निधन से थोड़ी मद्धम जरूर हुई थी पर शिक्षा के इस मंदिर की गन्दगी का स्वछता अभियान शासन की अच्छी आदतों में शुमार होने तक और जांच की बीरबल वाली खिचड़ी में जल्द तेज छौंक लगाने की डीएम साहब और सीओ साहब की क्रिया और बीएसए साहब की सोनभद्र को बेहतरीन बनाने में आ रहे इन काले धब्बो को मिटाने तक जारी रहेगी। 


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