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असमाजिक संगठनों की भागीदारी, किसानों और सरकार के सामंजस्य के बीच बन रही रोड़ा-वशिष्ठ कुमार गोयल

वशिष्ठ  गोयल ने कहा किसान सरकार के प्रस्ताव पर असामाजिक संगठनों से ना करें चर्चा खुद करें विचार किसानों के नाम पर जब तक होगी राजनीति तब तक नहीं निकलेगा हल



























 
ऋतू सैनी
लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया  
गुड़गांव।यू तो मंगलवार को भारत बंद किसानों ने बुलाया था, लेकिन अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए बंद को देश की तमाम विपक्षी पार्टियों ने हाईजैक कर लिया। जिसकी वजह से वो बंद किसानों का ना होकर विपक्षी दलों का बनकर रह गया। नतीजा ये निकला कि किसानों द्वारा बुलाया गया बंद एक-दो राज्यों को छोड़कर समूचे देश में फेल हो गया। यह कहना है नव जन चेतना मंच के संयोजक वशिष्ठ कुमार गोयल का। श्री गोयल का कहना है कि कुछ असामाजिक संगठन है जो अपनी राजनीतिक रोटियां तोड़ने के कारण नहीं चाहते किसानों का भला हो वह सिर्फ आग में ही डालने जैसा काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा रखे जा रहे हो प्रस्ताव पर किसानों को खुद विचार करने की जरूरत है ना की ऐसे आ सामाजिक संगठनों से उस पर मशवरा करें। जिससे कि यह विवाद सुलझने की बजाय और बढ़ता जाए। किसानों के इस आंदोलन से अगर किसी को ज्यादा नुकसान होना है तो सिर्फ और सिर्फ किसानों को भी होगा जो लोग आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। वह किसानों के घाटे की भरपाई करने वाले हैं। वशिष्ठ कुमार गोयल ने कहा कि बंद के मिलेजुले असर रहने के बावजूद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आंदोलनकारी किसान नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया और उनके साथ कई घंटों तक वार्ता भी की। लेकिन फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। पिछली कई बैठकों की तरह मंगलवार को हुई बैठक भी बेनतीजा रही। बैठक में केंद्र सरकार ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए कि वो कानून को वापस नहीं लेने जा रही है।

 हालांकि केंद्र सरकार कानून संशोधन के जरिए किसानों की मांगों को मानते हुए लिखित में आश्वासन देने को भी तैयार थी। लेकिन केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव को भी आंदोलनकारी किसानों ने मानने से इनकार कर दिया। किसानों ने ये भी कहा कि वो अपने आंदोलन को और भी तीव्र करेंगे और 12 दिसंबर को दिल्ली-जयपुर हाईवे को भी जाम करेंगे। इस पर नव जन चेतना मंच के संयोजक वशिष्ठ गोयल ने फिर से किसानों और केंद्र सरकार से लचीला रुख अपनाने की अपील की। वशिष्ठ गोयल ने कहा कि किसान और सरकार दोनों जिद पर अड़े हुए है। दोनों में से कोई झुकने को तैयार नहीं है और ये स्थिति ठीक नहीं है। वार्ता से ही मामले का हल निकल सकता है। दोनों में से अगर एक भी अपनी जिद पर अड़ा रहता है, तो इस मसले का कभी हल नहीं हो सकता। गोयल ने कहा कि अगर केंद्र सरकार किसानों की मांगों को मानते हुए कानूनों में संशोधन करने को तैयार है और वो लिखकर देने की बात भी कर रही हैं तो किसानों को एक बार सरकार की सुननी चाहिए। उन्हे अपने रुख में नरमी लानी चाहिए। जितना ये किसानों का आंदोलन लंबा चलेगा। उसका आम आदमी को तो नुकसान होगा ही, किसान को भी घाटा ही होगा। फिलहाल आंदोलन का नुकसान सब्जी उगाने वाले किसान उठा रहे है। आंदोलन की वजह से किसानों को सब्जियों के सही दाम नहीं मिल पा रहे है। साथ ही वशिष्ठ गोयल ने कहा कि ये आंदोलन जितना जल्दी खत्म हो, उतना ही आम जनता के लिए बेहतर है। क्योंकि आंदोलन की आंड़ में असामाजिक तत्व भी इसमें घुसना शुरु हो गए है।

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