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विजय पथ-सम्पादकीय-लेख-खास रपट लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वनभूमि पर कब्जा अभियान को लेकर चले इट पत्थर ,फ़ारवाचर जख्मी , रेंजर बालबाल बचे बन कालोनी के बगल की घटना

  राजेश कुमार सिंह  लोकल न्यूज ऑफ इंडिया  बीजपुर , सोनभद्र। स्थानीय पुनर्वास स्थिति रेनुकूट बीजपुर मार्ग के उत्तर पटरी पर वन बिभाग के कालोनी के पास वनभूमि पर एक पक्ष द्वारा दीवाल बनाने को लेकर शनिवार को वनकर्मियों पर जम कर इट पत्थल चले । जानकारी के अनुसार पत्थल बाजी में वन बिभाग का एक फारवाचर जख्मी हो गया। गनीमत रही कि मौके पर पहुँचे वन रेंज अधिकारी मु० जहीर मिर्ज़ा इस पत्थल बाजी में बालबॉल बच गए। बाद में पुलिस को दी गयी सूचना पर मामला हाईप्रोफल होने के कारण रफादफा करा कर शांत कराया गया। बताया जाता है कि वर्तमान समय मे वनभूमि पर निर्माण कार्य की महामारी जैसी आपदा चल रही है। हर कोई कब्जा अभियान में नहाना चाहता है। इसी को लेकर पुनर्वास स्थिति एक चर्चित ब्यक्ति की वनभूमि में बढाई जा रही बाउंड्री को वन कर्मी रोकने पहुँचे थे। जहां सूचना पर रेंजर भी पहुँच गए और निर्माण हो रही बाउंड्री को गिराया जाने लगा फिर क्या था इसी बीच वन कर्मियों पर ईंट पत्थल चलने लगे जिसमे दुर्गा प्रसाद वन कर्मी के पैर में एक पत्थल लगने से वह जख्मी हो कर गिर गया। हलाकि बवाल बढ़ता देख कब्जा धारी मौका देख फरार हो गए। इसबा

कौन तय करेगा देशभक्ति का पैमाना

विजय शुक्ल  आज हर शख्श सवालिया निशान  के घेरे में हैं।  सत्ता सियासत से इतर पत्रकार हो या किसान या फिर आम आदमी सबके लिए कुछ ख़ास अलग अलग पैमाने वाली देशभक्ति की पैमाइश हैं जिसको तय करने वाले लोग शायद यह भी नहीं जानते की देशभक्ति हैं क्या बला।  क्या सिर्फ सोशल मीडिया पर या व्हाट्सप्प पर बड़ी बड़ी बाते लिखने वाले लोग चिलम चढ़ाकर यह तय करेंगे कि  देश किसका हैं ? अगर हमारे प्रधानमंत्री मन की बात करते हैं तो अच्छी बात हैं।  हमारे मुखिया को हम सबको सम्हालने सवारने का पूरा हक़ हैं।  पर अगर किसान भले ही किसी एक राज्य के जागरूक बन सड़क पर अपने मन की बात करने आये हैं तो उनके लिए कील ठुकवाना भी जायज तो नहीं कहा जा सकता।  संसद में अगर सांसद आये हैं तो उनको चुनने के पीछे लोकतंत्र ही रहा होगा उनके इलाके वाला भले वो पक्ष का हो या विपक्ष का।  पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल विहारी बाजपेयी जी का कथन की जिस देश में विरोध के स्वर को ना सूना जाए वह लोकतंत्र का कोई मायने नहीं शायद आज उन्ही की भाजपा वाली सत्ताधारी सरकार के लिए एक कहावत हैं।  मेरे लिखने का  कही से भी मतलब कांग्रेस , समाजवादी या आम आदमी पार्टी को स

नहीं रहे मोतीलाल वोरा , पत्रकार से मुख्यमंत्री पद तक सफर

विजय शुक्ल  लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया  दिल्ली। मोतीलाल वोरा नहीं रहे।  चुनावी  कैंपेन के सिलिसले में उनसे कई बार मिलना रहा। अच्छे सुलझे हुए खजांची होने के साथ साथ सबकी सुनने की उनकी कला अपनापन तो देती ही थी।  उनका जीवन भी फ़िल्मी दुनिया सरीखा सा रहा मानो कोई रील चल रही हो।  राजस्थान में जन्म लेने वाले अविभाजित मध्यप्रदेश में रायपुर से पढ़ाई करने वाले वोरा का राजनीतिक सफरनामा बड़ा ही अलग और रोमांचित करने वाला रहा है। चाहे वो  दुर्ग  से पत्रकारिता करते हुए पार्षद निर्वाचित होना और फिर विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री बन जाना रहा हो या फिर  राज्यसभा सदस्य बनते ही वे केंद्रीय मंत्री पद से नवाजा जाना  सब दिलचस्प था।  कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार माने जाने वाले वोरा राजनीतिक शुचिता के लिए भी पहचाने जाते हैं।कांग्रेस वरिष्ठ नेता पूर्व कोषाध्यक्ष व मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा ने 92 वर्ष की उम्र में अस्वस्थता के चलते आज दिल्ली के निजी चिकित्सालय में अंतिम सांस ली।  गांधी परिवार के खासमखास थे वोरा और राहुल गांधी को आगे बढ़ाने में हमेशा अग्रसर भी  मोतीलाल वोरा राजनीति में आने से पहले

गिरते पारे पर अन्नदाता की बढ़ती फ़ौज

विजय शुक्ल  लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया  दिल्ली।   वैसे तो ताली थाली और दिया जलाने वाली आम जनता  जिसमे सब शामिल रहे थे अपने पीएम के साथ क्योकि उनको लगता था कि  मंदिर की रार वो या कश्मीर की ३७० वाली चिंघाड़ मोदी जी ने सब निपटा दिया।  कही अदालत के जरिये तो कही बिल के जरिये। कुछ को पसंद आया कुछ को नहीं भी भाया पर सबने साथ दिया।  समय भी सही था कोरोना की कैद में इस तरह की एक दो कैद और सही। अब अगर कश्मीर के लोगो की बात करेंगे तो उनका दर्द तो वही जाने और उन्होंने ही झेला हैं सो हम यहां बैठकर उनके दर्द की टींस कत्तई नहीं महसूस कर सकते बाकी लोग  करते हैं तो यह उनकी कला हैं।  बहरहाल नागरिकता बिल के निपटारे के बाद मानो सरकार ने ठान लिया हो कि  अब वो सब कुछ निपटा देंगे क्योकि अगर लोगो की माने तो ना मकान बचा हैं और ना दुकान।  पर मीडिया वालो की माने तो सब चंगा हैं जबकि हर तरफ  पंगा ही पंगा हैं।  बहरहाल आज किसान बिल पर चारो तरफ शहादत से लेकर अन्नत्याग जैसा कार्यक्रम चल रहा हैं और टीवी पर सरकारी एजेंडे को सेट करती डिबेट्स भी।  अब रही बात किसानो की तो वो मस्त होकर बैठ गए हैं बॉर्डर पर।  रोटी , पिज़्ज़ा और पकौड़े

मोदी और किसानो के बीच फंसे भाजपाई

विजय शुक्ल  लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया  दिल्ली . कितनी अजीब बात हैं आज मोदी जी के प्रति शत  प्रतिशत वफादार भाजपाई बड़ी असमंजस में हैं और मानो आगे कुआँ  पीछे खाई वाली कहावत इन्ही के लिए बनायी गयी हो।  एक तरफ जहां किसान बिल को लेकर किसान सड़क पर हैं और ज्यादातर  खेती किसानी से जुड़े लोगो के मोदी जी के पीछे पीछे भक्त तो बन गए पर आज जब वो अपने परिवार के लोगो को सड़क पर देख रहे हैं तो उनका साथ देना चाहते हैं और शायद दे भी रहे हैं।  वही दुसरी और सोशल मीडिआ पर धारदार पोस्ट करने वाले इन  भाजपाई रण बांकुरो के होश फाख्ता हैं और यह ना तो किसान बिल के समर्थन में लिख पा रहे हैं ना विरोध कर  पा रहे हैं।  क्योकि  विपक्ष में लिखे तो भाजपा सख्त  और पक्ष में लिखे तो किसान तल्ख।  अब ज़रा उनके बारे में सोचिये जो पंजाब और हरियाणा में हैं उन की हालत तो और खराब हैं क्योकि किसान उनके घर बार को ढूंढकर कही उनके चौखट पर तालाबंदी ना कर दे।  अब जिनको चुनाव लड़ना हैं वो ना तो पार्टी के विरुद्ध जा  सकते हैं और ना किसानो के।  बस वो इन्तजार कर रहे हैं कि  कोई करिश्मा हो और किसान वापस चले जाय क्योकि उनको यह पता हैं कि  मोदी जी तो

थोड़ी ज्यादा खराब हैं मेरी भाषा , हो सकता हैं यह मेरे माटी की तासीर बयान करती हो

                                                                                                                   फोटो साभार : अंबरीश कुमार  विजय शुक्ल  लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया  दिल्ली।   अपनों की दुनिया में से एक और नाम कम हो गया।  उसकी देह अब माटी में मिल गयी पर उसकी रूह का करिश्मा मेरे जेहन में सदा के लिए वास कर गया। जी हाँ मंगलेश डबराल जी की ही बात कर रहा हूँ। एक मुस्कुराता चेहरा ठीक वैसा जैसे पहाड़ की खूबसूरती मुस्कुराती रहती हैं।  बड़े सरल और सहज वैसे ही जैसे उनके गाँव के पास से बहती मंदाकिनी और भगीरथ की निर्मलता।  आज वो बेबस याद आने लगे उनकी सीट के पास से दो बार चाय का कप लेकर मैं गुजरा और वो दौर शुक्रवार पत्रिका के प्रकाशन का मानो वापस लौट आया हो।  उनकी मस्त देवानंद सरीखी लहराती  चाल के साथ की विजय जी क्या  थोड़ी देर के लिए मैं आपकी बालकनी किराए पर ले लूँ.  इतना सहज मैंने और शायद किसी के साथ महसूस किया हो।  और जब बात वर्तनी और संसोधनो की आती तो मानो वो पहाड़ जैसे अटल खड़े रहते।  कोई समझौता नहीं और कोई गुंजाइश नहीं किसी भी प्रकार की गलती की।   आज किसी ने मेरी एक खबर पर मुझसे चर्चा में

निराला के लिए करुणा और परपीड़ा हरण थे धर्म के मूल तत्व

निराला के लिए करुणा और परपीड़ा हरण थे धर्म के मूल तत्व   डॉ. अरविंद कुमार शुक्ल   दु:ख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूं आज जो नहीं कही। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का व्यक्तिगत जीवन दुख का सागर है। बचपन में ही माँ का गुजर जाना, और युवावस्था में जीवनसाथी मनोहरा देवी का साथ छोड़ देना जिनके द्वारा श्रीरामचंद्र कृपालु भजमन, ह्रदय भव भव दारुणम् को सुनकर निराला जी हिंदी की ओर आकृष्ट होते हैं। मनोहरा देवी के निधन से उत्पन रिक्तता वात्सल्य में तलाशते हैं 'आकाश बदलकर बना मही' किंतु महाकवि के साथ काल की निष्ठुरता का अंत कहाँ होने वाला था, 'कन्ये गत गतकर्मों का अर्पण कर, कर, करता मैं तेरा तर्पण। और यह अर्पण और तर्पण सूर्यकांत त्रिपाठी के जीवन का स्थाई भाव बन जाता है। जो कुछ भी है, दूसरों के लिए अर्पित। बचपन में मां का साया छूट गया था, इसलिए मात्र बेटा संबोधन से मोहित हो वृद्धा को जाड़े में अपनी रजाई दे देते हैं और 300 रुपये में से 100 रुपये साहित्यिक मित्र को, 60 रुपये परीक्षार्थी को और 40 रुपये का मनीऑर्डर जरूरतमंद को। यह है सूर्यकांत त्रिपाठी की शून्य साधना।     अंतिम जन के लिए सब

दशानन ने नहीं बल्कि उसके इस सौतेले भाई ने बसाई थी सोने की लंका

दशानन ने नहीं बल्कि उसके इस सौतेले भाई ने बसाई थी सोने की लंका   पंडित विनय शर्मा  लोकल न्यूज ऑफ इंडिया    हरिद्वार . रामायण  से जुड़ी कहानियां तो हम अकसर ही सुनते आए है. रामायण ने हमें राम की विजय, एक आदर्श पुत्र, पति, भाई, और प्रशासक, योद्धा, रावण, बहु-प्रधान असुर राजा पर अद्वितीय, की जीत के बारे में बताया. लेकिन आज रामायण से जुड़े उस सम्राट की बात कर रहे है जिसके बिना रामायण की कहानी अधूरी रह जाएगी. हम बात ककर रहे लंका के सम्राट जिनके पास और भी बहुत कुछ है जो आंख से मिलता है. एक जटिल चरित्र जो एक धर्मनिष्ठ राजा था, उसे अक्सर खलनायक के रूप में अद्वितीय माना जाता है. ज्यादातर देशों में वह सीता का अपहरण करने वाले और युद्ध शुरू करने वाले खलनायक के रूप में दागी जाती है, जिसका दुरुपयोग करने वाला एक क्रूर दमनकारी शासक ज्ञान और वरदान है. फिर भी श्रीलंका में रावण की अलग राजा और मानव की छवि है. उन्हें भगवान शिव का एक महान अनुयायी, एक महान विद्वान, एक योग्य शासक और अवन का एक उस्ताद, रावणहत्था के रूप में जाना जाता है.  वहीं रामायण में स्वर्ण नगरी लंका का अद्भुत वर्णन किया गया है. कहा जा

जाने दुनिया की सबसे रहस्यमय द्वीप, जहां साल में केवल एक दिन जाते हैं लोग

जाने दुनिया की सबसे रहस्यमय द्वीप, जहां साल में केवल एक दिन जाते हैं लोग       अंजलि यादव  लोकल न्यूज ऑफ इंडिया  दिल्ली. प्रकृति का अद्भुत नजारा देखने के लिए या अक्सर लोग छुट्टियां बिताने के लिए किसी न किसी आइलैंड पर चले जाते हैं. क्योंकि आइलैंड की खूबसूरती ही ऐसी होती है, जो लोगों का मन मोह लेती है. लेकिन आज हम आपको दुनिया के ऐसे आइलैंड के बारे में बताएंगे, जो रहस्यों से भरा है. सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि इस आइलैंड पर आने के लिए लोगों को साल में सिर्फ एक दिन की इजाजत मिलती है. द्वीप को नक्शे में ढूंढ पाना मुश्किल दरअसल, हम बात आइनहैलो द्वीप की कर रहे हैं, जो स्कॉटलैंड में स्थित है. दिल के आकार का यह द्वीप इतना छोटा है कि इसे नक्शे में ढूंढ पाना भी बेहद ही मुश्किल है. आइनहैलो आइलैंड को लेकर कई तरह की रहस्यमय कहानियां भी प्रचलित हैं. ऐसी मान्यता है कि इस द्वीप पर भूत-प्रेत समेत शैतानी ताकतें बसती हैं। ये ताकतें इतनी शक्तिशाली हैं कि जो भी अकेले या छोटे समूह में द्वीप पर जाने की कोशिश करे, वो गायब हो जाता है. बुरी आत्माएं होने की मान्यता स्कॉटलैंड में खासकर ऑर्कने के लो

जाने पटना कॉलेज में किसके के समर्थन से जीते थे लालू

जाने पटना कॉलेज में किसके के समर्थन से जीते थे लालू अंजलि यादव  लोकल न्यूज ऑफ इंडिया  दिल्ली।  जैसा की सभी जानते है की बिहार में विधानसभा चुनाव 2020 को लेकर जोरदार तैयारी चल रही है. वही हम बिहार के चुनाव को देखते हुए बिहार के रोचक चुनावी किस्‍सों के साथ पेश हुए हैं. जैसा की सभी जानते है की लालू प्रसाद यादव अपने चुटीली बातों और अपने मनमोहक भाषा शैली के लिए चर्चित हैं. वहीं उनकी अपनी पार्टी राष्‍ट्रीय जनता दल की कांग्रेस से दोस्ती है. लालू को भाजपा के धुर विरोधी नेता के रूप भी पहचाना जाता है. तो आइए आज हम जानेंगे की कॉलेज में ABVP के समर्थन से जीतने के बाद राजनीति में आपने कदम रखने सफर तक कैसे पहुंचे थे. समाजवादी आंदोलन से राजनीति की शुरूआत करने वाले लालू के बारे में खास किस्‍सा ये भी है कि छात्र राजनीति में उन्‍हें बड़ी जीत 1973 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के समर्थन से मिली थी. ठीक इसी तरह सूबे की राजनीति में उन्‍हें बड़ा ब्रेक भी 1990 में भाजपा के समर्थन से मिला था, जब जनता दल  के नेतृत्‍व वाले संयुक्‍त विधायक दल के नेता के रूप में उन्‍हें बिहार का मुख्‍यमंत्री बनन

महाराजा ने ना की होती मदद तो विदेश में नहीं पढ़ पाते बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर 

महाराजा ने ना की होती मदद तो विदेश में नहीं पढ़ पाते बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर  अंजलि यादव  लोकल न्यूज ऑफ इंडिया    दिल्ली. ये बात तो सभी जानते है कि भारत रत्न से नवाजित डॉ. भीमराव आंबेडकर का दलित समाज के उत्थान और उन्हें जागरुक करने में बहुत बड़ा योगदान हैं. और साथ ही यह भी की बचपन से ही आर्थिक और सामाजिक भेदभाव से जूझते हुए विषम परिस्थितियों में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपनी पढ़ाई शुरू की थी. जब डॉ. भीमराव आंबेडकर युवा थे, तो उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना था. ऐसे में उनके सामने आर्थिक संकट एक बहुत बड़ी समस्या थी. तो आइए जानते है की कैसे देश के महान हस्ती ने अपने जीवन में किन-किन परिस्थितिओं का सामना करके अपनी उच्च शिक्षा प्रप्त की थी. कोलंबिया यूनिवर्सिटी से चाहते  थे पढ़ना बता दें कि युवा भीमराव आंबेडकर अपनी स्नातकोत्तर पढ़ाई कोलंबिया यूनिवर्सिटी से करना चाहते थे. उनके विदेश में पढ़ने के सपने को साकार करने के लिए एक महाराजा ने मदद की थी. हाल ही में करेंट अफेयर्स पर आधारित रियलिटी शो कौन बनेगा करोड़पति में हॉट सीट पर बैठे एक प्रतियोगी से यह सवाल पुछा गया था. हालांकि प्रतियोगी

प्रणाम बापू ! बापू  तो हमारा  इम्युनिटी सिस्टम थे जिसकी आज देश को बहुत जरूरत हैं - फौज़िया अर्शी 

प्रणाम बापू ! बापू  तो हमारा  इम्युनिटी सिस्टम थे जिसकी आज देश को बहुत जरूरत हैं - फौज़िया अर्शी    फोटो :गूगल से साभार  विजय शुक्ल  लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया  दिल्ली।   आज बापू दिवस हैं। और आज शायद बापू की कमी सबसे ज्यादा खाल रही होगी तो उन लोगो को जिन्होंने बापू को जरूरी समझा हैं उन नासमझ अंधभक्तो को जो राष्ट्रवाद की अफीम में अभी डिजिटल हो रहे हैं उनको तो नाथूराम गोडसे ही अच्छे लगेंगे।  मेरी आपत्ति कोई गोडसे के अस्तित्व में होने या न अहोने से नहीं हैं और ना राष्ट्रभक्ति से हैं पर जिस तरह से आज राष्ट्रभक्ति की आड़ में बलात्कार का व्यापार चल रहा हैं इससे हैं।  क्योकि मैं भी एक बेटी का बाप हूँ अपनी बहनो का भाई हूँ ।  जानता हूँ की बेटियां क्या मायने रखती हैं और बहनो की राखी का हमारी कलाई में क्या महत्व होता हैं? मैं कोई ब्राह्मण संगठन बनाकर, दलित सम्राट बनकर , मौर्य वंशज होने का दावा करके सरकार के लिए सत्ता की हनक के लिए समाज को अपने चंगुल में फंसाने वाला नहीं हूँ और ना ही सत्ता की चापलूसी को स्वीकारने के लिए बाध्य।  अगर सच में मोदी जी महात्मा हैं तो अपनी पार्टी के अंदर बलात्कारी , छेड़छा

28 साल बाद बाबरी मस्जिद गिराने पर आया फैसला ,CBI के जज ने सबको किया बरी 

28 साल बाद बाबरी मस्जिद गिराने पर आया फैसला ,CBI के जज ने सबको किया बरी    बाबरी मस्जिद विवादित ढांचा ढहाए जाने का फैसला आज आ गया है। इस मुकदमे का आज 28 साल बाद फैसला आया है।  सोशल काका  लोकल न्यूज ऑफ इंडिया   लखनऊ। बाबरी मस्जिद विवादित ढांचा ढहाए जाने का फैसला आज आ गया है। इस मुकदमे का आज 28 साल बाद फैसला आया है। लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत के जस्टिस एस के यादव ने फैसला देते हुए कहा कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में जो घटना हुई, वह घटना सुनियोजित नहीं थी, यह अचानक से हुआ है, यह घटना अचानक से घटित हुई है। इसलिए इस मुकदमे में जो मुल्जिम हैं उनको बाबरी मस्जिद विध्वंस का दोषी नहीं पाया गया है जो आरोपी है वो बचने में लगे हुए थे । इसलिए सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया गया है ।   पुलिस ने विशेष सीबीआई कोर्ट के आसपास फोर्स तैनात किया हुआ कोर्ट के चारों तरफ बैरिकेडिंग लगाई गई तथा आने जाने वाले लोगों से हो रही पूछताछ के बाद ही उन्हें अंदर जाने दिया जा रहा है वही पुलिस अनजान व्यक्ति को जाने की परमिशन नहीं दे रही है। फैसले के बाद 32 आरोपियों में से 26 आरोपी अदालत में मौजूद रहे, जबकि छह अन्य आरोप

मीडिया का ड्रग्स , मोदी के दीन  दयाल  और लुटा किसान  रोड पर

मीडिया का ड्रग्स , मोदी के दीन  दयाल  और लुटा किसान  रोड पर    विजय शुक्ल  लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया  दिल्ली।   किसान तो हमेशा से ही हाशिये पर रहा हैं चाहे वो अंग्रेजो का काल हो या मुगलो का , नेहरू का हो या इंदिरा का  या फिर चौधरी चरण सिंह का ही क्यों न रहा हो।  या आज मनमोहन के मौन पर भारी मोदी की मन की बात का।  हर वक़्त किसान घुटता रहा टूटता रहा।  आकड़ो में अब वो आत्महत्या के लिए भी दर्ज नही है , मजदूर कोरोना में जो निपट गए उनसे सरकार ने पहले ही पल्ला झाड़ लिया।  बहरहाल यह ज्ञान देने का वक़्त नहीं बारीकी से यह समझने का वक़्त हैं की मीडिया कितनी सीधी सपाट तरीके से देश की बात देश को सूना रहा हैं।  देश सुशांत के बारे में सुनना चाहता था तो मीडिया ने कंगना की कलह सुनाना  शुरू कर दिया और अब जब मोदी जी ने किसानो को उबारने के लिए  आत्मनिर्भर किसान वाली दीन दयाल की शुरुवात बाकी की पूर्व में सभी योजनाबद्ध पीड़ा देने वाली योजनाओ की तरह उनके उन्मूलन के लिए, उनको जल जंगल जमीन से बेदखल करने के लिए, किसान बिल में इतना बड़ा बदलाव किया हैं तो जाहिर सी बात हैं मीडिया अब ड्रग्स दिखायेगा क्योकि देश किसान को

राफेल पर सीएजी ने तो सवाल उठा ही दिया

पंकज चतुर्वेदी नई दिल्ली . राफेल विमान की खरीद पर उठ रहे विवादों को भले ही सुप्रीम कोर्ट, चुनावी परिणामों और अन्य कई गोपनीय कारकों ने टाला लगा दिया हो, लेकिन भारत के भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक(सीएजी ) द्वारा तैयार और  संसद के मानसून स्तर के अंतिम दिन  प्रस्तुत की गयी रिपोर्ट में स सौदे में फ़्रांस की कम्पनी के प्रति पक्षपात के प्रमाण तो सामने आ ही गए हैं .  डिफेंस ऑफसेट पर जारी की गई सी ए जी  रिपोर्ट में कहा गया है कि 36 राफेल लड़ाकू विमान की डील के ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट की शुरुआत में (सितंबर 2015) यह प्रस्ताव था कि डीआरडीओ को हाई टेक्नॉलजी देकर वेंडर अपना 30 प्रतिशत ऑफसेट पूरा करेगा. लेकिन अभी तक टेक्नॉलजी ट्रांसफर सुनिश्चित  नहीं हुआ है. डीआरडीओ को यह टेक्नॉलजी स्वदेशी तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के लिए इंजन (कावेरी) विकसित करने के लिए चाहिए थी. अभी तक वेंडर ने ट्रांसफर ऑफ टेक्नॉलजी पर सहमती  नहीं दी है. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ऑफसेट पॉलिसी से मनमाफिक नतीजे नहीं निकल रहे हैं इसलिए मंत्रालय को पॉलिसी और इसे लागू करने के तरीकों की समीक्षा करने की जरूरत है. जहां पर दि

काशी मथुरा ,मंदिर की राजनीति की वापसी

काशी मथुरा ,मंदिर की राजनीति की वापसी राम पुनियानी लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया दिनदहाड़े बाबरी मस्जिद ध्वस्त किए जाते समय एक नारा बार-बार लगाया जा रहा था: “यह तो केवल झांकी है, काशी मथुरा बाकी है”. सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी मस्जिद की भूमि उन्हीं लोगों को सौंपते हुए, जिन्होंने उसे ध्वस्त किया था, यह कहा था कि वह एक गंभीर अपराध था. बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद राम मंदिर का उपयोग सत्ता पाने के लिए और समाज को धार्मिक आधार पर बांटने के लिए किया गया. बार-बार यह दावा किया गया कि भगवान राम ने ठीक उसी स्थान पर जन्म लिया था. यही आस्था राजनीति का आधार बन गई और अदालत के फैसले का भी. यह धार्मिक राष्ट्रवाद देश की राजनीति में मील का पत्थर बना. परंतु अब क्या? वैसे तो ऐसे मुद्दों की कोई कमी नहीं है जिनसे धार्मिक आधार पर समाज को बांटा जा सकता है और धार्मिक अल्पसंख्यकों को हाशिये पर लाने के लिए जिनका उपयोग होता है. इनमें से कुछ तो विघटनकारी राजनीति करने वालों के एजेंडे में स्थायी रूप से शामिल कर लिए गए हैं. जैसे, लव जिहाद (अब इसमें भूमि जिहाद, कोरोना जिहाद, सिविल सर्विसेस जिहाद आदि भी जुड़ गए हैं), पवित्र गाय,

सत्तर के हुए मोदी

शिशिर सोनी नई दिल्ली .ये उन दिनों की बात है. तब भाई नरेंद्र मोदी संगठन का कामकाज देखा करते थे. दिल्ली के अशोक रोड स्थित भाजपा मुख्यालय के बगल वाली कोठी में एक कमरा उनके पास था. तब अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण अडवाणी, गोविंदाचार्य, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, उमा भारती सहित दर्ज़न भर से ज्यादा बेहद सशक्त नेताओं की बेहद एक्टिव टीम-भाजपा थी, फिर भी नरेंद्र मोदी के पास खबरों की भरमार होती थी सो पत्रकारों का जमघट उनके पास सबसे ज्यादा होता था. उस समय मैं अकेला ऐसा पत्रकार था जो दिल्ली के पुराना किला रोड स्थित तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के घर भी जाता था और मोदी जी से भी मिलता था. उम्र में सबसे छोटा था, मगर खबरों की खबर के लिए मोदी जी और केसरी जी मुझे पसंद करते थे. केसरी जी और मोदी जी में एक बड़ी समानता रही, न केसरी जी ने अपने परिजनों को राजनीति में आगे बढ़ाया, न मोदी जी ने. परिवारवाद के दोनों घोर विरोधी रहे. बाद में नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम और फिर देश की सियासत में बड़ा उलटफेर कर लोकप्रिय प्रधानमंत्री बने. जिनके साथ आपने समय बिताया हो वो सीएम, पीएम बनें तो जाह

आज फिर आया साल भर बाद हिंदी पखवाड़ा

विजय शुक्ल लोकल न्यूज ऑफ़ इंडिया करीब हर साल दुसरे तीज त्यौहारों की तरह हिन्दी पखवाड़ा फिर वापस आया जिसका इन्तजार सरकारी खजाने वाले बेसब्री से किया करते थे हर साल।  क्योकि यही उनकी दीवाली होती थी और यही उनकी ईदी . वो अलग बात है कि  हिंदी आज भी वही है जहां पहले थी सरकारी कामकाज से दूर बस रिसेप्शन बोले तो स्वागत कक्ष में।  जहां बैठी या बैठा हुआ एक व्यक्तित्व आपसे बोलेगा की कहिये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ  या कर सकती हूँ। पर सवाल बड़ा है कि  क्या हम हर साल श्राद्ध जैसा हिंदी भाषा का तरपान करते नहीं नजर आ रहे।  जो भाषा हमारे रग रग में बसती हैं उसका एक दिन या एक पखवाड़ा अल्पसंखयको जैसा ट्रीटमेंट तो नहीं।  चलो मान लेते है कि  तमिल, तेलुगु , कन्नड़ , ओड़िया, असमिया, कोंकड़ी, मराठी, मलयालम जैसी भाषाई राज्यों में हिंदी दिवस का मनाया जाना सार्थक कदम हो सकता था पर हिंदी राज्यों में जहां बच्चा उठता बैठता ही हिंदी स्टाइल में है वहा इस पखवाड़े का इंतजाम कर ऐसा नहीं लगता की हिंदी के जीवित होने का सबूत पेश किया जा रहा हो  वो भी तब  जब हम हिंदी की समृद्ध गाथा की डींगे हांकते फिरते हैं।  हिंदी भाषा को

बर्तन और खाने का रिश्ता निराला 

देखिये जनादेश चर्चा  में -किन बर्तनों से बचना चाहिए फजल इमाम मल्लिक लोकल न्यूज ऑफ इंडिया नई दिल्ली . जायकेदार और पौष्टिक भोजन हर किसी की चाहत होती है लेकिन इनके बीच महत्त्वपूर्ण सवाल पर अधिकांश लोग ध्यान नहीं देते. खानपान पर बात तो होती है लेकिन किस तरह के बरतनों का इस्तेमाल खाना बनाने में हो इसकी कभी चर्चा शायद ही सुनी हो. कैसे हों हमारे बर्तन और हम किन बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं. क्या वह सुरक्षित हैं खाना बनाने के लिए या उससे कोई नुकसान हो सकता है. जनादेश ने अपने कार्यक्रम भोजन के बाद-भोजन की बात में रविवार को बरतनों पर चर्चा की. देखा जाए तो अपने आप में यह चर्चा अनूठी रही और कहा जा सकता है कि पहली बार इस तरह की चर्चा किसी सार्वजनिक मंच पर हुई है. प्रियंका संभव ने चर्चा की शुरुआत की और कहा कि हम किस तरह के बरतनों में खाना बनाएं और बरतनों का स्वास्थ्य से क्या रिश्ता होता है, यह जानना जरूरी है. चर्चा में शेफ अन्नया खरे, पूर्णिमा अरुण, पत्रकार आलोक जोशी और जनादेश के संपादक अम्बरीश कुमार ने हिस्सा लिया. अम्बरीश कुमार ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि बरतनों का अनुभव मेरा बचपन से ही

ग्यारह घंटे पैदल सफर कर हाल लेने पहुंचे एक मुख्यमंत्री

ग्यारह घंटे पैदल सफर कर हाल लेने पहुंचे एक मुख्यमंत्री   विजय शुक्ल  लोकल न्यूज ऑफ इंडिया  तवांग .पूर्वोत्तर राज्यों का जिक्र अक्सर उग्रवाद के सिलसिले में किया जाता रहा है. लेकिन इलाके की सकारात्मक खबरें न तो मुख्यधारा की मीडिया तक पहुंचती हैं और न ही देश के दूसरे लोग इस बारे में भनक मिलती है. इलाके में तमाम राजनेता अक्सर अपने कामकाज से ऐसी मिसाल कायम करते रहे हैं जिनके बारे में देश के बाकी हिस्सों में रहने वाले लोग कल्पना भी नहीं कर सकते. तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री जब सुरक्षाकर्मियों की भारी भरकम फौज, कारों के लंबे काफिले और हेलीकाप्टरों से दौरों पर निकलते हैं तो ऐसे में किसी को इस बात का भरोसा नहीं होगा कि कोई मुख्यमंत्री अपने चुनाव क्षेत्र में गांव वालो की समस्याएं जानने-समझने के लिए 11 घंटे पैदल सफर भी कर सकता है. सुनने में यह मामला भले अविश्वसनीय लगे, लेकिन है सोलहों आने सच. यह मिसाल कायम की है चीन की सीमा से लगे पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के मुयमंत्री पेमा खांडू ने. उन्होंने इसी सप्ताह तवांग जिले के दुर्गम गांव लुगुथांग पहुंचने के लिए महज एक सुरक्षाकर्मी के साथ 14 किम