गुंजन लोकल न्यूज ऑफ इंडिया दिल्ली. भारत में स्वतंत्रता के बाद दो बड़े जनआंदोलनों ने देश की राजनीति और समाज पर गहरा प्रभाव डाला। पहला था जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ जेपी आंदोलन और दूसरा था अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में चला भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन। आज जेपी जी हमारे बीच नहीं हैं और अन्ना जी भी उन्नत आयु में हैं। ऐसे समय में अन्ना जी द्वारा स्थापित राष्ट्रीय लोकआंदोलन न्यास तथा अखिल भारतीय पंचायत परिषद ने देशभर के पुराने आंदोलनकारियों, समाजसेवियों, जननेताओं, बुद्धिजीवियों और रचनात्मक कार्यकर्ताओं को पुनः एक मंच पर लाने का संकल्प लिया है। इसी उद्देश्य से आगामी 26 जून को दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की जा रही है। इस बैठक का उद्देश्य देश के विभिन्न जनआंदोलनों से जुड़े अनुभवी साथियों की पहचान कर उन्हें एकजुट करना तथा उनके मार्गदर्शन और सानिध्य में राष्ट्रहित एवं जनहित के मुद्दों पर एक सशक्त राष्ट्रीय मंच तैयार करना है। यह बैठक पूर्णतः गैर-राजनीतिक होगी। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि देश में ईमानदार, सक्षम, संवेदनशील और जनसेवा के ...
डॉ विजय शुक्ल भारतीय राजनीति में इन दिनों एक नया पहाड़ा पढ़ाया जा रहा है। वह पहाड़ा जो स्कूलों में नहीं पढ़ाया गया, लेकिन राजनीतिक मंचों, टीवी बहसों और सोशल मीडिया के गलियारों में खूब सुनाई दे रहा है। पहाड़ा कहता है— तीन एक्कम एक। पहली नजर में यह गणित की गलती लगती है। आखिर तीन एक्कम तीन होता है, एक कैसे हो गया? लेकिन राजनीति का गणित अक्सर अंकगणित से नहीं चलता। यहां समीकरण सत्ता लिखती है, व्याख्या प्रचार करता है और जनता उसे अपने-अपने चश्मे से देखती है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद पर बारह बरस पूरे होने के बाद देश में यही नया राजनीतिक गणित चर्चा में है। तथ्य कहते हैं कि भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वालों की सूची में आज भी जवाहरलाल नेहरू पहले स्थान पर हैं। इंदिरा गांधी दूसरे स्थान पर हैं। नरेंद्र मोदी तीसरे स्थान पर हैं। आंकड़े साफ हैं, कैलकुलेटर भी यही बताता है और इतिहास की किताबें भी। लेकिन राजनीति कह रही है कि नहीं, मामला इतना सीधा नहीं है। और भाजपा चूँकि दुनिया की सबसे बड़ी सियासी पार्टी हैं तो अब जो वो इतिहास का पन्ना लिखेगी उसको एक सौ चालीस करोड़ भारतीय सीख...