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प्रोफेसर सकलानी के नेतृत्व में नई शिक्षा नीति का प्रयोग — एनसीईआरटी गढ़ रही भारत के भविष्य की पाठशाला



डॉ विजय शुक्ल 

लोकल न्यूज ऑफ इंडिया

नई दिल्ली. स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही भारत ने केवल औपनिवेशिक शासन से मुक्ति ही नहीं पाई थी, बल्कि अपने अतीत को समझने और उसे नई पीढ़ियों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी भी अपने हाथों में ली थी। यह जिम्मेदारी शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से पूरी की जानी थी और शिक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम बनीं इतिहास की पाठ्य पुस्तकें। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि स्वतंत्रता के बाद लिखे गए इतिहास में कई ऐसे पहलू रहे जिन पर अपेक्षित गहराई से चर्चा नहीं हो पाई। कई घटनाएँ और प्रसंग या तो सीमित रूप में सामने आए या उन्हें एक विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया। इसी कारण समय-समय पर इतिहास लेखन को लेकर यह प्रश्न उठता रहा कि क्या हमारी पाठ्य पुस्तकें भारत के अतीत की पूरी कहानी कह पाती हैं या नहीं।

भारत का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता परिवर्तन की घटनाओं का क्रम नहीं है। यह एक ऐसी सभ्यता की कहानी है जिसकी जड़ें हजारों वर्षों में फैली हुई हैं। वेदों, उपनिषदों, बौद्ध दर्शन, जैन परंपरा, भक्ति आंदोलन और असंख्य सांस्कृतिक धाराओं से निर्मित इस देश की पहचान केवल राजनीतिक घटनाओं से नहीं बनती, बल्कि उससे कहीं अधिक गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभवों से बनती है। लंबे समय तक इतिहास की पाठ्य पुस्तकों को पढ़ते हुए कई अध्येताओं को यह अनुभव होता रहा कि इस विशाल सभ्यता की आत्मा कहीं पीछे छूट गई है और इतिहास का वर्णन सत्ता के उतार-चढ़ाव तक सीमित होकर रह गया है।

मध्यकालीन इतिहास के संदर्भ में यह आलोचना विशेष रूप से सामने आती रही कि मंदिरों के विध्वंस, सांस्कृतिक संघर्षों और धार्मिक टकरावों जैसे विषयों को प्रायः केवल राजनीतिक या आर्थिक कारणों से जोड़कर समझाया गया। यह तर्क दिया जाता रहा कि शासकों द्वारा मंदिरों को नष्ट करने के पीछे मुख्य कारण उनकी आर्थिक संपदा या राजनीतिक शक्ति का प्रतीक होना था। इस व्याख्या में एक हद तक तथ्य अवश्य हो सकते हैं, किंतु अनेक इतिहासकारों का मानना है कि केवल इसी दृष्टिकोण से घटनाओं को समझना इतिहास की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता। इतिहास बहुआयामी होता है और उसमें राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और आस्था—सभी के तत्व शामिल होते हैं। यदि किसी घटना को केवल एक ही कारण से समझाया जाए तो उसके अनेक पहलू छूट जाते हैं।

यही कारण है कि अब इतिहास लेखन के प्रति एक नई दृष्टि विकसित होती दिखाई दे रही है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी द्वारा पाठ्य पुस्तकों में किए गए बदलाव इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा हैं। इन परिवर्तनों को केवल पाठ्यक्रम संशोधन के रूप में नहीं बल्कि इतिहास को अधिक संतुलित और व्यापक रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि इतिहास के प्रत्येक अध्याय को ईमानदारी से सामने लाना आवश्यक है—चाहे वे गौरव के प्रसंग हों या संघर्ष के।

मुगल काल के उदाहरण को ही लें। इतिहास की पुस्तकों में बाबर और औरंगज़ेब से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख अक्सर मिलता रहा है, किंतु अन्य शासकों के संदर्भ में कई प्रसंग अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहे। कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में यह उल्लेख मिलता है कि मुगल सम्राट जहांगीर के समय पुष्कर के वराह मंदिर को नष्ट किए जाने की घटना का जिक्र है। जहांगीर ने अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-जहांगीरी में इस प्रसंग का उल्लेख किया है। इतिहास के विद्यार्थियों के लिए इस प्रकार की घटनाओं को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे उस समय के शासकों की मानसिकता, सामाजिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक संघर्षों की झलक प्रदान करती हैं।

जहांगीर को प्रायः एक कला-प्रेमी सम्राट के रूप में याद किया जाता है। उसके शासनकाल में चित्रकला और ललित कलाओं को प्रोत्साहन मिला। प्रकृति के प्रति उसकी रुचि और सौंदर्यबोध की भी चर्चा की जाती है। लेकिन इतिहास का उद्देश्य केवल प्रशंसा करना नहीं बल्कि व्यक्तित्वों का समग्र आकलन करना भी होता है। यदि किसी शासक के सकारात्मक पक्षों की चर्चा की जाती है तो उसके शासनकाल की विवादास्पद घटनाओं को भी समझना उतना ही आवश्यक है। तभी इतिहास संतुलित बनता है और विद्यार्थी उस दौर की जटिलताओं को सही ढंग से समझ पाते हैं।

भारत की सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने असंख्य आक्रमणों, संघर्षों और चुनौतियों के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा। मंदिरों का निर्माण होता रहा, विश्वविद्यालयों की परंपरा विकसित हुई, साहित्य और दर्शन का विकास हुआ और समाज ने समय-समय पर स्वयं को नए रूप में पुनर्गठित किया। यदि इतिहास को इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में पढ़ाया जाए तो विद्यार्थी यह समझ पाएंगे कि भारत की कहानी केवल पराजयों की कहानी नहीं है, बल्कि यह पुनर्निर्माण और निरंतरता की कहानी है।

इसी संदर्भ में नई शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया है। इस नीति का उद्देश्य शिक्षा को भारतीयता की जड़ों से जोड़ना, विद्यार्थियों को अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना तथा ज्ञान को केवल परीक्षा केंद्रित न रखकर जीवन और समाज से जोड़ना है। नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के साथ एनसीईआरटी ने पाठ्यक्रम और पाठ्य पुस्तकों की व्यापक समीक्षा शुरू की है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 के आधार पर नई पुस्तकों का निर्माण शुरू हुआ है और धीरे-धीरे स्कूलों में उन्हें लागू किया जा रहा है। एनसीईआरटी के अनुसार नई पुस्तकों में सामग्री को लगभग 20 से 30 प्रतिशत तक कम किया गया है ताकि विद्यार्थियों पर अनावश्यक बोझ कम हो और अवधारणाओं को अधिक स्पष्टता से समझाया जा सके।

इस पूरी प्रक्रिया के पीछे एनसीईआरटी के निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी की भूमिका भी उल्लेखनीय मानी जा रही है। उनके नेतृत्व में यह प्रयास किया गया है कि पाठ्य पुस्तकों को केवल तथ्यों का संग्रह न बनाकर उन्हें बच्चों की समझ और मनोविज्ञान के अनुरूप बनाया जाए। सकलानी का मानना है कि शिक्षा तभी सार्थक होती है जब वह विद्यार्थियों को अपने अतीत से जोड़ सके और उन्हें अपनी सभ्यता की जड़ों से परिचित करा सके। इसी दृष्टि से स्थानीय इतिहास, भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों को भी पाठ्य सामग्री में स्थान देने का प्रयास किया गया है।

सकलानी के नेतृत्व में एनसीईआरटी का यह दृष्टिकोण इस बात का संकेत देता है कि इतिहास को केवल बोझिल पाठ के रूप में नहीं बल्कि एक जीवंत अनुभव के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। जब बच्चे अपने अतीत को समझते हैं तो उनमें अपने समाज और देश के प्रति स्वाभाविक जुड़ाव पैदा होता है। यही जुड़ाव उन्हें केवल अच्छे विद्यार्थी ही नहीं बल्कि जागरूक नागरिक बनने की दिशा में भी प्रेरित करता है।

निस्संदेह इतिहास के पाठ्यक्रम में किसी भी प्रकार का बदलाव अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए। इतिहास को किसी भी विचारधारा का उपकरण बनाना उचित नहीं है। उसका उद्देश्य किसी समुदाय या व्यक्ति के प्रति घृणा पैदा करना नहीं बल्कि अतीत की जटिलताओं को समझना होना चाहिए। किंतु उतना ही आवश्यक यह भी है कि इतिहास के कठिन अध्यायों से बचने के बजाय उनका ईमानदारी से सामना किया जाए।

आज की पीढ़ी ऐसे समय में पढ़ रही है जब सूचना और तकनीक की दुनिया तेजी से बदल रही है। ऐसे समय में अपनी पहचान और अपनी सभ्यता को समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि इतिहास की पाठ्य पुस्तकें विद्यार्थियों को यह समझाने में सफल होती हैं कि भारत की सभ्यता किन संघर्षों, उपलब्धियों और अनुभवों से गुजरकर आज के स्वरूप तक पहुँची है, तो यह शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य पूरा होगा।



शायद इसी कारण इतिहास की नई पुस्तकों को लेकर यह भावना भी उभरती है कि यह केवल पाठ्यक्रम परिवर्तन नहीं बल्कि एक व्यापक प्रयास है जिसमें भारत अपनी कहानी स्वयं कहने की तैयारी कर रहा है। यदि इतिहास को संतुलन, तथ्य और व्यापक दृष्टि के साथ लिखा जाए तो वह केवल किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं रहता। वह समाज की चेतना का हिस्सा बन जाता है। और जब ऐसा होता है तो इतिहास वास्तव में एक राष्ट्र की आत्मकथा बन जाता है—एक ऐसी आत्मकथा जिसमें भारत अपनी पूरी जटिलता, संघर्ष और गौरव के साथ दिखाई देता है।

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