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आम आदमी कमजोर तो नही

विजयपथ 


आम आदमी कमजोर तो नही 


बजट आया सबने अच्छा सबने बुरा कहा । टैक्स सुना कि पाँच लाख तक फ़्री हो गया गंगा यमुना की सफाई की तरह सुना है भारत नेट का बडा बजट सबको तोह्फे मे मिला कुल मिलाकर खुश हाल करने वाला ही बजट मिला । पर आम आदमी कमजोर हुआ या मजबूत सवाल आज भी वही का वही है । अब इसको दिल्ली के चुनाव से तो मत जोड़ कर देखिये जहां हर तरफ शाहीन बाग के कारण आम आदमी को सात सौ रुपए दिहाड़ी मिल रही है और वो उसमे खुश है क्योकी बजट मे ना तो नौकरी है ना रोजगार के साधन। पर क्या मोदी सरकार इन्फ्रा पर खर्च करके कोई गलती कर रही है या यह सब तय योजना के तहत हो रहे काम है या फिर किसी को खुश करने के लिये बनाये जा रहे प्रावधान है अगर सरकार इतना सब कुछ कर रही है तो यह जरूर सोचा होगा की टैक्स का बोझ और इन्फ्रा की मरम्मत का खर्च भी आगे जुड़ेगा और अगर इन्फ्रा के साथ बस यह दंगा हत्या और धरना ही बढ़ना है तो आम आदमी मजबूत कब होगा । यह अलग बात है कि केजरीवाल ने आम आदमी को मजबूत करने का खेल तो खेला पता नही अगर इतना काम हुआ है तो प्रचार पर ढिंढोरा पीटने की क्या जरूरत आन पड़ी वो चाहे मोदी जी हो या केजरीवाल जी। उसके पीछे सीधा सा मतलब है की इन नेताओ को कोई काम ना तो करना आया ना करवाना खुद जनता की मेहनत की कमाई पर टैक्स लगाकर उडाना आया और गुमराह करने के लिये फ़्री का झांसा देना । क्यू मुफ्त की बिजली और क्यू मुफ्त का पानी। और काहे को हम भरे कोई भी बिल यह सब तो आम आदमी का हक है उसको मिलना चाहिये। टैक्स सिस्टम को जितना मजबूत करना है करिये साफ सुथरा बनायिये सबके लिये एक समान चाहे वो आम आदमी हो या खास आदमी। सबकी आय का एक तय प्रतिशत काट लिजिये और दीजिए  सब कुछ फ़्री और नेता जो कां करेगे वो तन्ख्वाह तो ले ही रहे है तो अपने आने जाने और रुकने का इन्तजाम उसी मे से करे उनको रोका किसने है।पर गौर करियेगा आम आदमी भारत मे तो कमजोर हो ही रहा है दिल्ली मे गोलियो वाले हाथ भी उसको कमजोर कर रहे है हां इसमे बस खिल रहे है तो वो लोग जो बाकियो को गद्दार बताने का हुनर जानते है ।


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