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महाराज सन्त गाडगे परिनिर्वाण दिवस ओबरा नगर में मनाया गया



राकेश सिंह 

लोकल न्यूज ऑफ इंडिया 

ओबरा । स्थानीय ओबरा सपा कार्यालय पर कन्नौजिया युवा संगठन के जिलाध्यक्ष छात्र संघ के पूर्व महामंत्री अजीत कन्नौजिया की अध्यक्षता में महान संत श्रद्धेय संत गाडगे महाराज जी का परिनिर्वाण दिवस मनाया गया,महान संत शिरोमणि के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें याद करते हुए उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लिया गया ।

कार्यक्रम के बाद मुख्यअतिथि जल पुरूष रमेश सिंह यादव के द्वारा भलुआ टोला, कर्बला,ईदगाह आदि क्षेत्रों में गरीबों के बीच बाबा सन्त गाडगे महाराज के विचारों को बताया गया और उनके बीच भीषण ठंड को देखते हुए कम्बल वितरित किया गया।

 कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अजित कुमार कनोजिया जी ने  बताया कि संत गाडगे जी एक धोबी समाज में जन्मे गरीब परिवार से है।उनके बारे में यह भी बताया कि संत गाडगे महाराज गरीबों व निर्धनों के लिए 

महाराष्ट्र के कोने-कोने में अनेक धर्मशालाएं, गौशालाएं, विद्यालय, चिकित्सालय तथा छात्रावासों का निर्माण कराया। यह सब उन्होंने भीख मांग-मांगकर बनावाया किंतु अपने सारे जीवन में इस महापुरुष ने अपने लिए एक कुटिया तक नहीं बनवाई। उन्होंने धर्मशालाओं के बरामदे या आसपास के किसी वृक्ष के नीचे ही अपनी सारी जिंदगी बिता दी। 

 मुख्य अतिथि के रूप में ओबरा विधानसभा प्रभारी व जिला उपाध्यक्ष रमेश सिंह यादव ने कहा कि संत गाडगे जी ने एक लकड़ी, फटी-पुरानी चादर और मिट्टी का एक बर्तन जो खाने-पीने और कीर्तन के समय ढपली का काम करते थे, यही उनकी संपत्ति थी। इसी से उन्हें महाराष्ट्र के भिन्न-भिन्न भागों में कहीं मिट्टी के बर्तन वाले गाडगे बाबा व कहीं चीथड़े-गोदड़े वाले बाबा के नाम से पुकारा जाता था। गाडगे जी गरीब परिवार से है उनके लिए समाज हमेशा याद करते है। 

 विशिष्ट अतिथि जिलाध्यक्ष शिक्षक सभा समाजवादी पार्टी त्रिरत्न शुक्लेश ने कहा कि 

गाडगे बाबा का जन्म 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेणगांव अंजनगांव में हुआ था। उनका बचपन का नाम डेबूजी झिंगराजी जानोरकर था। संत गाडगे बाबा के जीवन का एकमात्र ध्येय था- लोक सेवा। दीन-दुखियों तथा उपेक्षितों की सेवा को ही वे ईश्वर भक्ति मानते थे। धार्मिक आडंबरों का उन्होंने प्रखर विरोध किया। उनका विश्वास था कि ईश्वर न तो तीर्थस्थानों में है और न मंदिरों में व न मूर्तियों में। 

संत गाडगे बाबा ने तीर्थस्थानों पर कईं बड़ी-बड़ी धर्मशालाएं इसीलिए स्थापित की थीं ताकि गरीब यात्रियों को वहां मुफ्त में ठहरने का स्थान मिल सके। नासिक में बनी उनकी विशाल धर्मशाला में 500 यात्री एक साथ ठहर सकते हैं। वहां यात्रियों को सिगड़ी, बर्तन आदि भी निःशुल्क देने की व्यवस्था है। दरिद्र नारायण के लिए वे प्रतिवर्ष अनेक बड़े-बड़े अन्नक्षेत्र भी किया करते थे, जिनमें अंधे, लंगड़े तथा अन्य अपाहिजों को कम्बल, बर्तन आदि भी बांटे जाते थे।

 नगर अध्यक्ष विपिन कश्यप जी ने कहा की पैसे की तंगी हो तो खाने के बर्तन बेच दो, औरत के लिए कम दाम के कपड़े खरीदो, टूटे-फूटे मकान में रहो पर बच्चों को शिक्षा दिए बिना न रहो. आधुनिक भारत को जिन महापुरूषों पर गर्व होना चाहिए, उनमें राष्ट्रीय सन्त गाडगे बाबा का नाम सर्वोपरि है।

 तीर्थों में पंडे, पुजारी सब भ्रष्टाचारी रहते हैं। धर्म के नाम पर होने वाली पशुबलि के भी वे विरोधी थे। यही नहीं, नशाखोरी, छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों तथा मजदूरों व किसानों के शोषण के भी वे प्रबल विरोधी थे। संत-महात्माओं के चरण छूने की प्रथा आज भी प्रचलित है, पर संत गाडगे इसके प्रबल विरोधी थे।

संत गाडगे द्वारा स्थापित 'गाडगे महाराज मिशन' आज भी समाज सेवा में रत है। मानवता के महान उपासक के 20 दिसंबर 1956 को ब्रह्मलीन होने पर प्रसिद्ध संत तुकडो जी महाराज ने श्रद्धांजलि अर्पित कर अपनी एक पुस्तक की भूमिका में उन्हें मानवता के मूर्तिमान आदर्श के रूप में निरूपित कर उनकी वंदना की। उन्होंने बुद्ध की तरह ही अपना घर परिवार छोड़कर मानव कल्याण के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। 

कार्यक्रम में मुख्य रूप से नगर कोषाध्यक्ष सतेन्द्र ओझा,ज्यूतेश कुमार, गोपाल कनोजिया, सिकंदर कनोजिया, नागेंद्र प्रताप चौहान,शेरा पटेल,राजू यादव, राजू साहनी,अमरनाथ ,पंकज कनोजिया, रमेश सिंह,आदि लोग मौजूद रहे।

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