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भाजपा के किले में सामाजिक घुसपैठ !



डॉ विजय शुक्ल 

लोकल न्यूज ऑफ इंडिया 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय जो बदलाव दिख रहा है, वह सामान्य चुनावी हलचल नहीं है, बल्कि सत्ता के सामाजिक आधार पर सीधा हमला है। अखिलेश यादव अब केवल भाजपा के खिलाफ नहीं, बल्कि उसकी उस केमिस्ट्री के खिलाफ खड़े हैं जिसने पिछले एक दशक में उसे मजबूत और स्थिर बनाया। यह केमिस्ट्री भाषणों या नारों से नहीं बनी, बल्कि छोटे-छोटे सामाजिक समूहों को जोड़कर तैयार की गई एक ठोस संरचना है, जिसे अब समाजवादी पार्टी तोड़ने की कोशिश कर रही है।

भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी समाज को अलग-अलग हिस्सों में संगठित करके उसे राजनीतिक ताकत में बदला। राजभर, निषाद और कुर्मी जैसे समुदायों को उनके अपने-अपने नेताओं के जरिए प्रतिनिधित्व दिया गया और उन्हें यह भरोसा दिलाया गया कि वे सत्ता में हिस्सेदार हैं। यही कारण है कि इन जातियों का झुकाव भाजपा की ओर स्थिर बना रहा। लेकिन अब अखिलेश यादव इसी स्थिरता को अस्थिर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

समाजवादी पार्टी ने जिस तरह महिला नेतृत्व को सामने रखकर पीडीए की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश की है, वह केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं है। सीमा राजभर, रुक्मणी निषाद और पल्लवी पटेल जैसे चेहरों को आगे लाना दरअसल उन जातीय समूहों के भीतर एक वैकल्पिक नेतृत्व खड़ा करने का प्रयास है, जो अब तक भाजपा के सहयोगी दलों के प्रभाव में रहे हैं। यह रणनीति सीधे टकराव की नहीं, बल्कि भीतर से धीरे-धीरे आधार खिसकाने की है।

अखिलेश यादव की इस चाल की खासियत उसकी रफ्तार है। यह कोई तेज, आक्रामक और शोरगुल वाली राजनीति नहीं है, बल्कि चुपचाप आगे बढ़ती हुई ऐसी प्रक्रिया है जो जमीन पर असर पैदा करने की कोशिश करती है। उन्होंने समझ लिया है कि भाजपा को हराने के लिए उसके पूरे वोट बैंक को अपने पक्ष में लाना जरूरी नहीं है। अगर उसके सामाजिक आधार में थोड़ा भी कंपन पैदा हो जाए, तो उसका असर सीटों के परिणाम पर साफ दिखाई देगा।

यूपी की राजनीति में बहुत बड़े बदलाव की जरूरत नहीं होती। कुछ प्रतिशत वोटों का इधर-उधर होना ही चुनाव का परिणाम बदल देता है। यही वजह है कि अखिलेश यादव का लक्ष्य पूरी दीवार गिराना नहीं, बल्कि उसमें दरार पैदा करना है। अगर राजभर, निषाद और कुर्मी समाज के भीतर थोड़ी भी असंतुष्टि या विकल्प की भावना पैदा होती है, तो भाजपा का संतुलन बिगड़ सकता है।

हालांकि इस रणनीति के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भाजपा का संगठन मजबूत है और उसने अपने सामाजिक गठबंधन को केवल जातीय पहचान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सरकारी योजनाओं और लाभार्थी राजनीति से भी जोड़ा है। यही कारण है कि इन समुदायों के बीच भाजपा के प्रति भरोसा केवल नेता आधारित नहीं, बल्कि अनुभव आधारित भी है। ऐसे में केवल नए चेहरे खड़े कर देने से वोटों का रुख बदलना आसान नहीं होगा।

फिर भी, अखिलेश यादव की यह कोशिश उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया अध्याय खोल रही है। यह पहली बार है जब समाजवादी पार्टी इतने सुनियोजित तरीके से गैर-यादव ओबीसी समाज के भीतर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है। महिला नेतृत्व को आगे लाकर वह न केवल सामाजिक प्रतिनिधित्व का नया संदेश दे रही है, बल्कि यह भी दिखा रही है कि वह बदलती राजनीति के अनुरूप खुद को ढालने के लिए तैयार है।

 यह लड़ाई केवल दो पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि दो सामाजिक मॉडलों के बीच है। एक तरफ भाजपा का वह मॉडल है जिसमें सहयोगी दलों के जरिए जातीय संतुलन साधा गया है, और दूसरी तरफ सपा का नया प्रयोग है जो उसी संतुलन को भीतर से चुनौती देने की कोशिश कर रहा है। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि यह प्रयोग सफल होता है या फिर भाजपा की केमिस्ट्री पहले की तरह कायम रहती है, लेकिन इतना तय है कि अखिलेश यादव अब केवल प्रतिक्रिया नहीं दे रहे, बल्कि राजनीति की दिशा बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

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