डॉ मो अमीन
पूर्व संयुक्त निदेशक, भारतीय चुनाव आयोग
पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव परिणामों ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र की उस जटिल सच्चाई को सामने ला दिया है, जिसे अक्सर राजनीतिक शोर में दबा दिया जाता है। चुनाव केवल वोट गिनने की प्रक्रिया नहीं होते, वे समाज की मनःस्थिति, जनता की अपेक्षाओं, राजनीतिक संगठनों की पकड़, प्रशासनिक विश्वास और समय के साथ बदलती जनभावनाओं का सम्मिलित परिणाम होते हैं। लेकिन आज के दौर में हर हार और हर जीत को किसी एक तकनीकी कारण से जोड़ देने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। बंगाल चुनाव के बाद भी कुछ ऐसा ही दिखाई दिया, जब पूरा विमर्श SIR यानी “Special Intensive Revision” और चुनाव आयोग की भूमिका के इर्द-गिर्द सिमटता नजर आया।
यह सच है कि मतदाता सूची की समीक्षा, प्रशासनिक निर्णय, अधिकारियों के तबादले और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठे। यह भी सच है कि मतगणना से पहले का माहौल सामान्य लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा से अधिक तनावपूर्ण था। लेकिन क्या किसी चुनाव परिणाम को केवल इसी एक पहलू से समझा जा सकता है? शायद नहीं।
लोकतंत्र में जनता का निर्णय अचानक नहीं बदलता। उसके पीछे वर्षों की सामाजिक हलचल, राजनीतिक घटनाएँ, स्थानीय नेतृत्व की विश्वसनीयता, संगठन की जमीन पर पकड़ और जनता के भीतर जमा होता असंतोष या विश्वास काम करता है। बंगाल में भी यही हुआ। यदि किसी दल का जनाधार लगातार बढ़ रहा था, यदि युवा मतदाता नई राजनीतिक भाषा की ओर आकर्षित हो रहे थे, यदि स्थानीय स्तर पर विकास, कानून-व्यवस्था, रोजगार और राजनीतिक स्थिरता जैसे मुद्दे मतदाताओं के बीच चर्चा का विषय बने हुए थे, तो चुनाव परिणाम केवल किसी प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं कहे जा सकते।
भारतीय राजनीति की एक बड़ी विडंबना यह भी है कि हार के बाद दल अक्सर आत्ममंथन से अधिक संस्थाओं पर प्रश्न खड़े करने लगते हैं। इससे तत्काल राजनीतिक लाभ भले मिल जाए, लेकिन लंबे समय में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर होने लगता है। यदि हर हार का कारण चुनाव आयोग, EVM, मतदाता सूची या प्रशासन को बताया जाएगा, तो आम मतदाता के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि फिर लोकतंत्र में उसकी भूमिका आखिर बचती क्या है?
दूसरी ओर संस्थाओं की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकायों को केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी उतना ही आवश्यक है। पारदर्शिता, संवाद और प्रक्रियाओं की स्पष्ट जानकारी आज लोकतंत्र की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। जब संस्थाएँ संवाद से बचती हैं, तो अविश्वास बढ़ता है और राजनीति उसी अविश्वास को हथियार बना लेती है।
बंगाल के इस चुनाव ने एक और बड़ा संकेत दिया है। आज का मतदाता पहले जैसा नहीं रहा। युवा वर्ग, शहरी मतदाता और पहली बार वोट देने वाली पीढ़ी केवल नारों या भावनात्मक भाषणों से प्रभावित नहीं होती। वह स्थानीय विकास, रोजगार, सुरक्षा, प्रशासनिक स्थिरता और भविष्य की संभावनाओं को भी देखती है। राजनीतिक दल यदि इन वास्तविक मुद्दों को छोड़ केवल तकनीकी बहसों में उलझे रहेंगे, तो वे जनता की बदलती सोच को समझने में चूक जाएंगे।
यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि विश्वास बनाए रखने की प्रणाली भी है। यदि राजनीतिक दल लगातार यह संदेश देंगे कि चुनावी प्रक्रियाएँ भरोसेमंद नहीं हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान स्वयं लोकतंत्र को होगा। जनता के भीतर यह भावना पनप सकती है कि उसका वोट नहीं, बल्कि कोई अदृश्य तंत्र परिणाम तय करता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए खतरनाक है।
बंगाल का चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने यह स्पष्ट किया कि भारत में अब चुनाव केवल राजनीतिक नहीं, संस्थागत बहस भी बन चुके हैं। लेकिन इस बहस को संतुलित रखना जरूरी है। संस्थाओं पर सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है, पर हर परिणाम को केवल साजिश या प्रशासनिक खेल बताना लोकतांत्रिक चेतना को कमजोर करता है।
अंततः चुनाव का सबसे बड़ा सत्य वही होता है जो मतदाता तय करता है। जनता कभी पूरी तरह खामोश नहीं होती। वह समय आने पर संकेत भी देती है और निर्णय भी। राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि वे जनता की नब्ज समझें, अपने संगठन और नेतृत्व का पुनर्मूल्यांकन करें और लोकतंत्र की संस्थाओं को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय उन्हें मजबूत करने की दिशा में काम करें।
क्योंकि लोकतंत्र केवल सत्ता बदलने का माध्यम नहीं, बल्कि विश्वास बचाए रखने की सबसे बड़ी व्यवस्था भी है।

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