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शेखर
साहित्य और विशेष रूप से शायरी केवल शब्दों का खेल नहीं है। वह मनुष्य के भीतर की संवेदनाओं, अनुभवों, संघर्षों, सपनों, प्रेम, पीड़ा और जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति है। शायरी का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के हृदय तक पहुँचना और उसके अनुभवों को शब्द देना है। किंतु समय-समय पर शायरी की धाराएँ बदलती रही हैं। भाषा, शैली, प्रतीक और अभिव्यक्ति के स्वरूप भी बदलते रहे हैं।
शायरी का अपना एक विशिष्ट व्याकरण और शिल्प है। उसके मूल नियमों का पालन किए बिना लिखी गई रचना उत्कृष्ट कविता तो हो सकती है, किन्तु उसे शायरी नहीं कहा जा सकता। शायरी की संरचना में बह्र, क़ाफ़िया और रदीफ़ का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। ये केवल तकनीकी तत्व नहीं, बल्कि शायरी की पहचान हैं। इनमें किसी प्रकार की त्रुटि या समझौता रचना को शायरी की पारंपरिक कसौटी से बाहर ले जाता है।
किन्तु केवल शिल्पगत शुद्धता ही पर्याप्त नहीं होती। एक अच्छे शेर में कोई ऐसी बात अवश्य होनी चाहिए जो विचार, अनुभूति या अनुभव के स्तर पर पाठक को छू सके। शेर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह केवल दो मिसरों में एक संपूर्ण भाव, विचार या अनुभूति को व्यक्त कर देता है। दोनों मिसरों के बीच स्वाभाविक और स्पष्ट संबंध होना चाहिए, ताकि बात बिखरी हुई न लगे, बल्कि एक पूर्ण इकाई के रूप में सामने आए।
अच्छे शेर की एक और पहचान उसकी संप्रेषणीयता है। पाठक या श्रोता को उसका आशय अनावश्यक जटिलता के बिना समझ में आ जाना चाहिए। गहराई और दुरूहता एक ही बात नहीं हैं। श्रेष्ठ शायरी वह है जो सरल शब्दों में भी गहरी बात कह सके।
और यदि शेर में कोई नई बात, अनपेक्षित मोड़, सूक्ष्म व्यंग्य, गहन जीवनानुभव या विचार की ताज़गी भी उपस्थित हो, तो उसकी प्रभावशीलता कई गुना बढ़ जाती है। ऐसा शेर केवल सुना या पढ़ा नहीं जाता, बल्कि स्मृति का हिस्सा बन जाता है। शिल्प की शुद्धता, भाव की पूर्णता, अभिव्यक्ति की स्पष्टता और कथ्य की नवीनता—इन सबका संतुलित समन्वय ही एक साधारण शेर को उत्कृष्ट शेर बनाता है।
आज के दौर में यदि समग्र रूप से देखा जाए तो शायरी को मोटे तौर पर तीन प्रमुख धाराओं में विभाजित किया जा सकता है। पहली धारा वह है जो अरबी-फ़ारसी शब्दों की अधिकता तथा इज़ाफ़त और अत्फ़ के अत्यधिक प्रयोग के कारण दुरूह और बोझिल हो गई है। दूसरी धारा वह है जो देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली ऐसी हिन्दी शायरी है जो उर्दू शब्दों से लगभग परहेज़ करती दिखाई देती है। तीसरी धारा वह है जो मनुष्य के सुख-दुःख, विडंबनाओं, संघर्षों और जीवन के अनुभवों को सहज भाषा में व्यक्त करते हुए इंसानों से सीधी गुफ़्तगू करती है।
इन तीनों धाराओं को समझना इसलिए आवश्यक है क्योंकि किसी भी शायर को अपनी रचनात्मक यात्रा में यह तय करना होता है कि वह किस दिशा में जाना चाहता है। कोई भी आलोचक, साहित्यिक संस्था या मंच किसी शायर की अंतिम पहचान निर्धारित नहीं कर सकता। अंततः शायर को अपना मूल्यांकन स्वयं करना होता है। इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि अपनी शायरी का दीपक स्वयं बनना आवश्यक है
शायरी की पहली धारा उन रचनाकारों की है जो यह मानते हैं कि शायरी जितनी कठिन होगी, उतनी ही श्रेष्ठ मानी जाएगी। उनकी रचनाओं में अरबी और फ़ारसी के दुर्लभ शब्दों की भरमार होती है। इज़ाफ़त और अत्फ़ का प्रयोग इतना अधिक होता है कि सामान्य पाठक अर्थ तक पहुँचने से पहले ही थक जाता है।
ऐसी शायरी में भाषिक कौशल अवश्य दिखाई देता है। शब्दों की चमक, लफ़्ज़ों की नफ़ासत और परंपरा का वैभव भी उसमें मौजूद होता है। किंतु प्रश्न यह है कि यदि पाठक अर्थ ही न समझ पाए तो शायरी का भाव उसके हृदय तक कैसे पहुँचेगा?
भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है, स्वयं लक्ष्य नहीं। जब माध्यम ही उद्देश्य बन जाए तो साहित्य का मूल स्वर कमजोर पड़ने लगता है। कठिन शब्दों का प्रयोग बुरा नहीं है, लेकिन यदि वे संवेदना पर हावी हो जाएँ तो कविता का जीवन-स्पर्श कम हो जाता है। कई बार ऐसी शायरी विद्वानों के छोटे से दायरे में प्रशंसा प्राप्त कर लेती है, पर सामान्य मनुष्य के जीवन में प्रवेश नहीं कर पाती।
यह स्थिति कुछ वैसी ही है जैसे कोई व्यक्ति अत्यंत सुंदर और बहुमूल्य पात्र में जल रखे, किंतु प्यासा व्यक्ति उसे पी ही न सके। शायरी की सार्थकता उसकी पहुँच में भी निहित होती है।
दूसरी धारा इसके विपरीत दिशा में दिखाई देती है। यहाँ कुछ रचनाकार उर्दू शब्दों से लगभग परहेज़ करते हुए केवल संस्कृतनिष्ठ या शुद्ध हिन्दी शब्दावली का प्रयोग करने पर बल देते हैं। कभी-कभी यह प्रवृत्ति भाषाई आग्रह या दुराग्रह का रूप भी ले लेती है।
वास्तविकता यह है कि हिन्दी और उर्दू सदियों से एक-दूसरे के साथ विकसित हुई भाषाएँ हैं। दोनों ने एक-दूसरे को समृद्ध किया है। कबीर, प्रेमचंद, निराला, फ़िराक़ और दुष्यंत कुमार की भाषा को देखें तो उसमें भारतीय जीवन की साझा सांस्कृतिक विरासत दिखाई देती है।
जब कोई शायर केवल भाषाई शुद्धता के आग्रह में पड़ जाता है तो उसकी अभिव्यक्ति कृत्रिम होने लगती है। साहित्य का उद्देश्य भाषाओं के बीच दीवारें खड़ी करना नहीं, बल्कि मनुष्यों के बीच संवाद स्थापित करना है।
यदि कोई शब्द भाव को अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कर सकता है तो केवल उसके भाषाई स्रोत के कारण उसे अस्वीकार करना साहित्यिक दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। भाषा का मूल्य उसके प्रभाव और अभिव्यक्ति की क्षमता से निर्धारित होता है, न कि केवल उसके मूल से।
तीसरी धारा सबसे अधिक जीवंत और मानवीय प्रतीत होती है। यह वह शायरी है जो मनुष्य के जीवन से जुड़ी हुई है। इसमें भाषा न तो अनावश्यक रूप से कठिन होती है और न ही किसी प्रकार के भाषाई आग्रह से ग्रस्त। यहाँ केंद्र में शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य होता है।
यह शायरी प्रेम की बात करती है, लेकिन केवल प्रेमिका की आँखों तक सीमित नहीं रहती। यह माँ की ममता, पिता के संघर्ष, मित्रता की गरमाहट, अकेलेपन की पीड़ा, टूटते रिश्तों की कसक और जीवन के संघर्षों की कहानी भी कहती है।
ऐसी शायरी आम आदमी की भाषा में उससे संवाद करती है। वह किसी मंच से उपदेश नहीं देती, बल्कि उसके साथ बैठकर उसकी बात सुनती और कहती है। यही कारण है कि ऐसी रचनाएँ लोगों के दिलों में जगह बनाती हैं।
कबीर की वाणी, प्रेमचंद का साहित्य, दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें और बशीर बद्र की शायरी इसी परंपरा के उदाहरण हैं। इन रचनाकारों ने यह सिद्ध किया कि महान साहित्य वही है जो मनुष्य के जीवन से जुड़ा हो।
प्रश्न यह है कि शायरी आखिर किसलिए लिखी जाती है?
क्या केवल अपनी विद्वत्ता प्रदर्शित करने के लिए?
क्या केवल किसी विशेष साहित्यिक समूह की स्वीकृति पाने के लिए?
क्या केवल भाषाई शुद्धता के प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए?
या फिर इसलिए कि मनुष्य के अनुभवों को शब्द मिल सकें?
यदि हम साहित्य के इतिहास को देखें तो पाएँगे कि जिन रचनाकारों ने मनुष्य के हृदय को छुआ, वही कालजयी बने। भाषा, शैली और तकनीक महत्वपूर्ण हैं, किंतु वे साधन हैं। साध्य है—मानव जीवन की अनुभूति।
जब कोई व्यक्ति किसी शेर को पढ़कर कहता है कि "यह तो मेरी ही बात है", तभी शायरी अपनी वास्तविक सफलता प्राप्त करती है।
आज सोशल मीडिया और मंचीय लोकप्रियता के युग में शायर के सामने सबसे बड़ी चुनौती है आत्ममूल्यांकन की। लाइक, शेयर, तालियाँ और प्रशंसाएँ कभी-कभी वास्तविक साहित्यिक मूल्यांकन का स्थान ले लेती हैं।
ऐसी स्थिति में प्रत्येक शायर को स्वयं से कुछ प्रश्न पूछने चाहिए—
क्या मेरी शायरी केवल शब्दों का प्रदर्शन है?
क्या मेरे शेर लोगों के जीवन से जुड़ते हैं?
क्या मेरी भाषा पाठक को आमंत्रित करती है या उससे दूरी बना देती है?
क्या मेरी रचनाओं में मनुष्य उपस्थित है?
क्या मेरी शायरी किसी पीड़ित, संघर्षरत या संवेदनशील व्यक्ति के हृदय तक पहुँच सकती है?
इन प्रश्नों के उत्तर ही शायर को उसकी वास्तविक दिशा दिखा सकते हैं।
भारतीय चिंतन में एक प्रसिद्ध वाक्य है—“अप्प दीपो भव” अर्थात् अपना दीपक स्वयं बनो। साहित्य की दुनिया में भी यह बात उतनी ही प्रासंगिक है।
हर शायर को यह अधिकार है कि वह अपनी भाषा, शैली और अभिव्यक्ति का चुनाव स्वयं करे। किंतु यह चुनाव जागरूकता और आत्मचिंतन पर आधारित होना चाहिए। केवल परंपरा का अनुकरण या केवल विद्रोह के लिए विद्रोह साहित्य को महान नहीं बनाता।
जब शायर अपनी रचनाओं को इस दर्पण में देखता है कि उसकी शायरी मनुष्य से कितनी जुड़ती है, तब वह अपनी वास्तविक साहित्यिक पहचान खोज पाता है। उसे यह समझ में आने लगता है कि उसके शब्द लोगों के जीवन में रोशनी ला रहे हैं या केवल शब्दों के जंगल खड़े कर रहे हैं।
आज की शायरी अनेक दिशाओं में विकसित हो रही है। कहीं भाषाई जटिलता का आकर्षण है, कहीं भाषाई शुद्धता का आग्रह है और कहीं मनुष्य के जीवन से सीधा संवाद स्थापित करने का प्रयास है। इन तीनों धाराओं का अस्तित्व अपनी-अपनी जगह है, किंतु किसी भी शायर के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उसकी शायरी मनुष्य के हृदय तक कितनी पहुँचती है।
साहित्य का इतिहास बताता है कि अंततः वही रचनाएँ जीवित रहती हैं जो मनुष्य के अनुभवों को आवाज़ देती हैं। शब्दों की कठिनता या सरलता से अधिक महत्वपूर्ण उनकी संवेदनात्मक शक्ति होती है। जो शायरी इंसान के आँसू, मुस्कान, संघर्ष, उम्मीद और सपनों को अभिव्यक्ति देती है, वही समय की कसौटी पर टिकती है।
इसलिए हर शायर को चाहिए कि वह अपनी रचनाओं को इस दर्पण में देखे। वह स्वयं से पूछे कि उसके शब्द लोगों के जीवन से कितना संवाद स्थापित कर रहे हैं। यदि वह ईमानदारी से यह आत्मपरीक्षण कर सके, तो उसे किसी बाहरी प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं रहेगी। तब वह सचमुच अपनी शायरी के लिए अपना दीपक स्वयं बन सकेगा।

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