डॉ विजय शुक्ल
भारतीय राजनीति में इन दिनों एक नया पहाड़ा पढ़ाया जा रहा है। वह पहाड़ा जो स्कूलों में नहीं पढ़ाया गया, लेकिन राजनीतिक मंचों, टीवी बहसों और सोशल मीडिया के गलियारों में खूब सुनाई दे रहा है। पहाड़ा कहता है—तीन एक्कम एक।
पहली नजर में यह गणित की गलती लगती है। आखिर तीन एक्कम तीन होता है, एक कैसे हो गया? लेकिन राजनीति का गणित अक्सर अंकगणित से नहीं चलता। यहां समीकरण सत्ता लिखती है, व्याख्या प्रचार करता है और जनता उसे अपने-अपने चश्मे से देखती है।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद पर बारह बरस पूरे होने के बाद देश में यही नया राजनीतिक गणित चर्चा में है। तथ्य कहते हैं कि भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वालों की सूची में आज भी जवाहरलाल नेहरू पहले स्थान पर हैं। इंदिरा गांधी दूसरे स्थान पर हैं। नरेंद्र मोदी तीसरे स्थान पर हैं। आंकड़े साफ हैं, कैलकुलेटर भी यही बताता है और इतिहास की किताबें भी।
लेकिन राजनीति कह रही है कि नहीं, मामला इतना सीधा नहीं है। और भाजपा चूँकि दुनिया की सबसे बड़ी सियासी पार्टी हैं तो अब जो वो इतिहास का पन्ना लिखेगी उसको एक सौ चालीस करोड़ भारतीय सीखेंगे।
तर्क दिया जा रहा है कि नेहरू का शुरुआती कार्यकाल उस दौर का था जब सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार वाला चुनाव नहीं हुआ था। इसलिए आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के पैमाने पर यदि केवल चुनाव जीतकर बने प्रधानमंत्रियों की बात की जाए तो मोदी सबसे आगे हैं। यहीं से शुरू होता है वह नया राजनीतिक पहाड़ा जिसमें तीसरा स्थान अचानक पहले स्थान में बदलने लगता है।
दरअसल यह बहस केवल दिनों की गिनती की नहीं है। यह उस बड़े संघर्ष का हिस्सा है जो पिछले एक दशक से भारतीय राजनीति में चल रहा है। संघर्ष केवल सत्ता का नहीं, बल्कि विरासत का भी है। संघर्ष केवल वर्तमान का नहीं, बल्कि इतिहास की व्याख्या का भी है।
नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के शायद पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने सिर्फ चुनाव नहीं जीते, बल्कि राजनीतिक विमर्श का केंद्र भी अपने नाम कर लिया। आज विपक्ष की राजनीति भी मोदी के इर्द-गिर्द घूमती है और सत्ता की राजनीति भी। समर्थक उन्हें नए भारत का निर्माता बताते हैं तो विरोधी उन्हें लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती मानते हैं। लेकिन दोनों पक्ष एक बात पर सहमत दिखाई देते हैं—देश की राजनीति का केंद्रबिंदु मोदी ही हैं।
यही वजह है कि अब लड़ाई केवल वर्तमान शासन की उपलब्धियों या विफलताओं पर नहीं लड़ी जा रही। लड़ाई इस बात पर भी है कि भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे बड़ा नेता किसे माना जाए।
दिलचस्प यह है कि इस बहस में इंदिरा गांधी लगभग गायब कर दी गई हैं। जबकि कुल कार्यकाल के मामले में वह आज भी मोदी से आगे हैं। लेकिन राजनीतिक कथा का स्वभाव ही ऐसा होता है। उसे अक्सर दो ध्रुव चाहिए होते हैं। इसलिए कहानी भी नेहरू बनाम मोदी की बनाई जा रही है। एक तरफ स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री, दूसरी तरफ इक्कीसवीं सदी का सबसे प्रभावशाली प्रधानमंत्री।
गांव की चौपालों से लेकर शहरों की कॉफी टेबल तक आम आदमी की दिलचस्पी इस बात में कम है कि किसी नेता ने कितने दिन शासन किया। उसकी चिंता यह है कि उसके जीवन में क्या बदला। महंगाई कितनी है, रोजगार कहां है, खेती का हाल क्या है, व्यापार कितना सुरक्षित है, शिक्षा और स्वास्थ्य कितने सुलभ हैं। जनता का गणित अक्सर सत्ता के गणित से अलग होता है।
लेकिन राजनीति में प्रतीकों का महत्व कम नहीं होता। रिकॉर्ड बनाना और रिकॉर्ड बताना दोनों अलग-अलग चीजें हैं। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि चुनावी राजनीति में उपलब्धियों की कथा जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतना ही महत्वपूर्ण होता है उसका प्रस्तुतीकरण। इसलिए 12 वर्ष पूरे होने का उत्सव केवल शासन का उत्सव नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है—कि मोदी अब केवल वर्तमान के नेता नहीं, इतिहास की श्रेणी में प्रवेश कर चुके हैं।
फिर भी इतिहास इतना सरल नहीं होता कि उसे केवल नए नारे से बदला जा सके। इतिहास अपने समय, परिस्थितियों और संदर्भों के साथ खड़ा रहता है। नेहरू का युग अपनी चुनौतियों के साथ था, मोदी का युग अपनी चुनौतियों के साथ है। दोनों की तुलना हो सकती है, लेकिन दोनों को एक ही तराजू पर तौलना हमेशा आसान नहीं होगा।
फिर भी राजनीति की खूबी यही है कि वह कठिन सवालों को भी आसान नारों में बदल देती है। इसलिए आज देश के सामने नया राजनीतिक पहाड़ा रखा जा रहा है—तीन एक्कम एक।
सवाल यह नहीं कि यह पहाड़ा सही है या गलत। सवाल यह है कि क्या देश इसे मानने को तैयार है? क्या तीसरे स्थान पर खड़े नेता को राजनीतिक कथा का पहला नायक घोषित कर दिया जाएगा? क्या इतिहास की पुरानी किताबें नए राजनीतिक चश्मे से पढ़ी जाएंगी?
फैसला आखिर जनता को मानना ही पड़ेगा क्योंकि लोकतंत्र में रिकॉर्ड सत्ता बनाती है, लेकिन इतिहास जनता से लिखवाने का प्रचलन लागू हैं। और जब इतिहास और राजनीति आमने-सामने खड़े हों, तब सबसे बड़ा सवाल यही होता है—क्या सचमुच तीन एक्कम एक हो सकता है, या फिर यह सिर्फ सत्ता का नया पहाड़ा है?

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