पोर्टल पर ‘निस्तारण’, जमीन पर फरियादी परेशान—2027 में जनता पूछेगी, साहब समाधान हुआ या सिर्फ फाइल बंद हुई?
यूपी में अफसरशाही पर बढ़ते सवाल, जनसुनवाई और आईजीआरएस की व्यवस्था पर उठ रही उंगलियां।
व्योमेंद्र कुमार सिंह
लोकल न्यूज ऑफ इंडिया
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, शासन-प्रशासन की कार्यशैली भी राजनीतिक चर्चा का अहम मुद्दा बनती जा रही है। सरकार की ओर से जनसुनवाई और आईजीआरएस को आम आदमी की शिकायतों के समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम बताया जाता है। आधिकारिक पोर्टल पर शिकायत दर्ज करने, उसकी स्थिति देखने, समयसीमा पार होने पर अनुस्मारक भेजने और निस्तारण पर फीडबैक देने की व्यवस्था मौजूद है।
लेकिन सवाल उस समय खड़ा होता है जब ऑनलाइन निस्तारण और जमीन पर वास्तविक समाधान के बीच दूरी दिखाई देने लगे।
2026 में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आईजीआरएस शिकायतों के निस्तारण में लापरवाही के मामले सामने आए हैं। आगरा में शिकायतों के कथित फर्जी निस्तारण और खराब फीडबैक पर मंडलायुक्त ने अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा और शिकायतकर्ता से बात किए बिना निस्तारण न करने के निर्देश दिए।
लखनऊ में भी नगर निगम से जुड़ी शिकायतों के मामले में करीब 25 अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस दिए जाने की खबर सामने आई। प्रशासनिक जांच में शिकायतकर्ता से संपर्क किए बिना या मौके का निरीक्षण किए बिना कार्रवाई रिपोर्ट अपलोड किए जाने जैसी अनियमितताएं सामने आने की बात कही गई।
झांसी के मऊरानीपुर में तो एक शिकायत के निस्तारण में दूसरे व्यक्ति की जांच आख्या लगाए जाने की खबर सामने आई। वहीं देवरिया में आईजीआरएस मामलों के निस्तारण में लापरवाही और त्रुटिपूर्ण कार्रवाई को लेकर चार अधिकारियों को नोटिस जारी किए गए।
मऊ में समय से शिकायतों का समाधान न होने के मामले में 57 अधिकारियों का वेतन रोकने के आदेश की खबर भी सामने आई। सितंबर 2026 में बस्ती प्रशासन ने भी आईजीआरएस शिकायतों में अनावश्यक देरी या लापरवाही पर विभागीय कार्रवाई की चेतावनी दी।
कागज पर समाधान, धरातल पर इंतजार?
इन घटनाओं से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर शिकायत निस्तारण की सफलता का पैमाना क्या हो—पोर्टल पर ‘निस्तारित’ लिख देना या शिकायतकर्ता की समस्या का वास्तविक समाधान होना?
सरकार का अपना जनसुनवाई पोर्टल भी नागरिकों को निस्तारण के बाद फीडबैक देने की सुविधा देता है और उच्च अधिकारी निस्तारित संदर्भों को पुनः जीवित कर सकते हैं। यानी व्यवस्था में गुणवत्ता की निगरानी का प्रावधान स्वयं मौजूद है।
फिर भी जब अलग-अलग जिलों में लापरवाही पर नोटिस और कार्रवाई की खबरें सामने आती हैं तो अफसरशाही की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
2027 में बड़ा मुद्दा बन सकता है ‘जनता बनाम सिस्टम’
विधानसभा चुनाव 2027 में सड़क, बिजली, रोजगार, कानून-व्यवस्था और विकास के साथ-साथ सरकारी कार्यालयों में आम आदमी की सुनवाई भी चर्चा का विषय बन सकती है।
जनता का सवाल सीधा है—
अगर शिकायत के लिए पोर्टल है, अधिकारियों की जिम्मेदारी तय है और शिकायत पर फीडबैक की व्यवस्था भी है, तो फिर फरियादी को अपनी ही शिकायत का समाधान कराने के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर क्यों लगाने पड़ें?
आखिर लोकतंत्र में सरकार का सबसे बड़ा परीक्षण सिर्फ यह नहीं कि कितनी योजनाएं घोषित हुईं, बल्कि यह भी है कि एक आम नागरिक की आवाज सरकारी दफ्तर की चौखट से निकलकर वास्तव में समाधान की मेज तक पहुंची या नहीं।
2027 के चुनावी माहौल में यही सवाल सत्ता और विपक्ष—दोनों के सामने रहेगा।
(लेखक चुनावी प्रबंधन संस्था इलेक्टलाइन में राजनीतिक विश्लेषक और लोकल न्यूज ऑफ इंडिया में ब्यूरो हेड हैं।)

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