शैलजा भाटिया
आखिर कितनी और घटनाओं के बाद गुरुग्राम में नागरिकों की सुरक्षा को किसी घटना के बाद की जाने वाली कार्रवाई के बजाय एक मजबूत व्यवस्था का हिस्सा माना जाएगा?
गोल्फ कोर्स रोड पर एक महिला बाइक सवार का कथित रूप से पीछा कर उसे टक्कर मारने की घटना और पार्किंग विवाद में एक कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिक के साथ कथित मारपीट ने एक बार फिर गुरुग्राम की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों मामलों की पूरी सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी और कानून को अपना काम करना चाहिए। लेकिन इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल हमारे सामने रख दिया है—क्या गुरुग्राम के नागरिक वास्तव में अपने शहर में सुरक्षित महसूस करते हैं?
गुरुग्राम में सड़क पर गुस्सा, तेज और लापरवाही से वाहन चलाना, सार्वजनिक स्थानों पर झगड़े और मारपीट, महिलाओं की सुरक्षा तथा नागरिक सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं कोई नई बात नहीं हैं। वर्षों से ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। हर बार घटना के बाद आक्रोश होता है, प्राथमिकी दर्ज होती है, कार्रवाई के आश्वासन दिए जाते हैं और कुछ समय बाद मामला शांत हो जाता है।
आखिर यह सिलसिला कब खत्म होगा?
सवाल यह नहीं है कि पुलिस को इन घटनाओं की जांच करनी चाहिए या नहीं। निश्चित रूप से करनी चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या प्रशासन के पास ऐसी व्यवस्था है जो किसी खतरे को समय रहते पहचान सके, उसे रोक सके और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई कर सके।
गुरुग्राम को देश का मिलेनियम सिटी कहा जाता है। यह देश के प्रमुख व्यावसायिक और औद्योगिक केंद्रों में से एक है। यहां बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां हैं, देश-विदेश से लोग काम करने आते हैं और लाखों लोग इस शहर में रहते हैं।
हम गुरुग्राम को विश्वस्तरीय शहर बनाने की बात करते हैं। लेकिन किसी शहर की पहचान केवल उसके बड़े कार्यालयों, ऊंची इमारतों और चमक-दमक से नहीं होती।
एक शहर की असली पहचान उसकी सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर नागरिकों की सुरक्षा से होती है।
गुरुग्राम में सुरक्षा व्यवस्था को तकनीक के माध्यम से मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं। दिसंबर 2026 तक गुरुग्राम में 4,000 से अधिक निगरानी कैमरे लगाए जाने की योजना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल कैमरे लगा देने से सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी?
*यहां प्रशासन को जवाब देना होगा—इन कैमरों की निगरानी कौन करेगा?* क्या इनकी पुलिस नियंत्रण कक्ष से चौबीसों घंटे निगरानी होगी? किसी घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस कितनी जल्दी मौके पर पहुंचेगी? क्या किसी खतरनाक स्थिति को गंभीर घटना बनने से पहले पहचाना जा सकेगा? और अगर कैमरे किसी घटना को रिकॉर्ड कर लें, लेकिन पुलिस समय पर कार्रवाई न कर पाए, तो उस व्यवस्था का क्या लाभ?
दुनिया के कई शहरों ने सुरक्षा को केवल घटना के बाद की कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा है। सिंगापुर में पुलिस के निगरानी कैमरों को पुलिस की संचालन व्यवस्था से जोड़ा गया है, जिससे घटनाओं पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर पुलिस को तेजी से भेजने में मदद मिलती है। ब्रिटेन में भी महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सड़क की रोशनी, सुरक्षित रास्तों, सार्वजनिक स्थानों की बेहतर बनावट और निगरानी पर ध्यान दिया जाता है।
गुरुग्राम को किसी दूसरे शहर की नकल करने की जरूरत नहीं है। लेकिन हमें यह जरूर देखना होगा कि दूसरे शहरों ने रोकथाम, त्वरित प्रतिक्रिया और जवाबदेही के लिए क्या व्यवस्थाएं बनाई हैं और उनमें से क्या हमारे शहर में लागू किया जा सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—प्रशासन हर बार घटना होने के बाद ही क्यों जागता है?
क्या किसी नागरिक को मदद पाने के लिए पहले घटना का वीडियो बनाना होगा? क्या सोशल मीडिया पर मामला फैलने के बाद ही प्रशासन की सक्रियता दिखाई देगी?
गुरुग्राम आज देश के सबसे चमकदार और तेजी से विकसित होते शहरों में गिना जाता है। लेकिन गुरुग्राम की चमक तभी सार्थक है, जब उसके नागरिकों को अपनी सुरक्षा का भरोसा भी हो।
अगर सड़क पर निकलते समय लोगों को लापरवाह वाहन चालकों का डर हो, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा को लेकर चिंता हो और किसी विवाद के हिंसक होने पर तुरंत मदद मिलने का भरोसा न हो, तो विकास का यह मॉडल अधूरा है।
इसलिए अब केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं।
गुरुग्राम में व्यापक सुरक्षा समीक्षा होनी चाहिए, जिसमें संवेदनशील सड़कें और सार्वजनिक स्थान, सड़क की रोशनी, निगरानी कैमरे, पुलिस की तैनाती, आपातकालीन प्रतिक्रिया, यातायात नियमों का पालन, व्यावसायिक परिसरों की सुरक्षा और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े उपायों की समीक्षा की जाए।
इस समीक्षा के आधार पर स्पष्ट समय सीमा तय हो और हर स्तर पर जिम्मेदारी और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
गुरुग्राम ने देश के एक प्रमुख वैश्विक व्यावसायिक केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनाई है। अब जरूरत है कि उसकी सुरक्षा व्यवस्था भी उसी स्तर की हो।
क्योंकि शहर की असली चमक उसकी इमारतों में नहीं, उसके नागरिकों के भरोसे में होती है।
और यही वह भरोसा है जिसे अब गुरुग्राम प्रशासन को वापस मजबूत करना होगा।
( लेखिका पूर्व जिला अध्यक्ष (गुरुग्राम), अखिल भारतीय महिला कांग्रेस थी और एक सजग समाजसेविका के रूप में सक्रिय हैं)

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