धर्मबीर भांगरौला वरिष्ठ उप महापौर, अनूप सिंह भांभू उप महापौर निर्वाचित; सर्वसम्मति के पीछे संगठन, समाज और सत्ता के संतुलन का सधा संदेश
डॉ विजय शुक्ल
लोकल न्यूज ऑफ इंडिया
गुरुग्राम।नगर निगम गुरुग्राम में धर्मबीर भांगरौला का वरिष्ठ उप महापौर और अनूप सिंह भांभू का उप महापौर निर्वाचित होना सामान्य स्थानीय निकाय चुनाव भर नहीं है। दोनों का सर्वसम्मति से चुना जाना उस राजनीतिक बिसात की तरफ इशारा करता है, जिसमें भाजपा ने पद से ज्यादा सामाजिक संदेश साधने की कोशिश की है। और इस बिसात के बीच प्रदेश महामंत्री वेद फुल्ला की मौजूदगी इसे और दिलचस्प बना देती है।
हरियाणा के शिक्षा मंत्री महिपाल ढांढा पर्यवेक्षक तथा वेद फुल्ला और गुरुग्राम जिला प्रभारी संदीप जोशी सह-पर्यवेक्षक थे। मतदान की नौबत आए बिना वार्ड 28 के पार्षद एवं भाजपा एससी मोर्चा के जिलाध्यक्ष धर्मबीर भांगरौला और वार्ड 25 के पार्षद अनूप सिंह भांभू के नाम पर सहमति बन गई। राजनीति में कई बार मुकाबला जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण मुकाबले से पहले सहमति बना लेना होता है।
यहीं वेद फुल्ला का राजनीतिक कद पद से आगे दिखाई देता है।फुल्ला उन नेताओं में हैं जिनकी राजनीतिक समझ संगठन की जमीन पर लंबे समय तक काम करते हुए विकसित हुई है। दशकों का संगठनात्मक समर्पण कार्यकर्ता को केवल चुनाव लड़ना नहीं, समाज को पढ़ना भी सिखाता है। बूथ की बेचैनी, कार्यकर्ता की अपेक्षा और अलग-अलग सामाजिक समूहों की राजनीतिक आकांक्षा को करीब से देखने का यही अनुभव फैसलों में दिखाई देता है। गुरुग्राम का मौजूदा समीकरण भी महज नामों का चयन कम और सामाजिक संतुलन की कोशिश अधिक नजर आता है।
गुरुग्राम की राजनीति को केवल साइबर सिटी के चश्मे से पढ़ना सबसे बड़ी भूल होगी। चमकते कॉरपोरेट शहर के पीछे एक बड़ा ग्रामीण भूगोल है, जहां यादव, जाट, अनुसूचित जाति और दूसरे सामाजिक समूह राजनीति को प्रभावित करते हैं। गांव, बिरादरी, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक स्वीकार्यता यहां आज भी चुनावी गणित का हिस्सा हैं। इसलिए निगम की दो महत्वपूर्ण कुर्सियों पर बैठाए गए चेहरों के सामाजिक संदेश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
धर्मबीर भांगरौला का चयन इस दांव का सबसे स्पष्ट हिस्सा है। वह पार्षद के साथ भाजपा गुरुग्राम एससी मोर्चा के जिलाध्यक्ष हैं। उन्हें वरिष्ठ उप महापौर बनाकर भाजपा ने अनुसूचित जाति समाज को महज संगठन में जगह नहीं, सत्ता में भागीदारी का संदेश दिया है। किसी सामाजिक वर्ग के बीच राजनीतिक भरोसा भाषणों से कम और हिस्सेदारी से ज्यादा बनता है।
अनूप सिंह भांभू का उप महापौर बनना इस समीकरण का दूसरा सिरा है। उनके स्थानीय एवं ग्रामीण राजनीतिक आधार को साथ रखकर देखें तो भाजपा ने एक ही फैसले में अलग-अलग सामाजिक धाराओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। महत्वपूर्ण यह भी है कि यह संतुलन किसी खुले संघर्ष के बाद नहीं, सर्वसम्मति के साथ सामने आया।
यही इस फैसले की असली केमिस्ट्री है।हरियाणा की राजनीति लंबे समय से मजबूत जातीय प्रभावों के बीच चलती रही है। दक्षिण हरियाणा में यादव प्रभाव हो या प्रदेश के अनेक हिस्सों में जाट राजनीति की ताकत—किसी भी दल के लिए केवल एक सामाजिक धुरी पर टिककर विस्तार करना आसान नहीं है। भाजपा की चुनौती इसलिए अपने मौजूदा आधार को बचाते हुए दलित और दूसरे सामाजिक समूहों में हिस्सेदारी का भरोसा बढ़ाने की है।गुरुग्राम का फैसला इसी बड़ी तस्वीर का छोटा लेकिन महत्वपूर्ण फ्रेम हो सकता है।धर्मबीर भांगरौला जैसे दलित संगठनात्मक चेहरे को महत्वपूर्ण पद मिलने का संदेश यदि ग्रामीण हरियाणा तक पहुंचता है तो भाजपा के लिए इसका लाभ केवल आरक्षित सीटों तक सीमित रहने की जरूरत नहीं है। अनुसूचित जाति मतदाता कई सामान्य विधानसभा क्षेत्रों में भी चुनावी संतुलन प्रभावित करते हैं। पंजाब से सटे हरियाणा के क्षेत्रों में भी दलित मतदाता राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में सत्ता में हिस्सेदारी का एक सफल मॉडल भाजपा के लिए भविष्य में राजनीतिक संदेश बन सकता है।
हालांकि यहां एक फर्क समझना जरूरी है। किसी एक पद से कोई पूरा सामाजिक वर्ग राजनीतिक दिशा नहीं बदलता। इसके लिए प्रतिनिधित्व के साथ सम्मान, संगठन में भागीदारी और सरकार के काम का भरोसा भी चाहिए। इसलिए गुरुग्राम का प्रयोग भाजपा के लिए मंजिल नहीं, एक राजनीतिक संकेत भर है।यही कारण है कि वेद फुल्ला की भूमिका गौर करने लायक है। लंबे समय तक जमीन पर संगठन करने वाला नेता जानता है कि जातीय अंकगणित और सामाजिक केमिस्ट्री एक चीज नहीं हैं। अंकगणित बताता है कि किसके कितने वोट हैं; केमिस्ट्री यह तय करती है कि वे वोट किस परिस्थिति में एक-दूसरे के साथ खड़े हो सकते हैं।
गुरुग्राम में भाजपा ने शायद इसी केमिस्ट्री को छुआ है।एक तरफ दलित संगठन से निकला चेहरा, दूसरी तरफ ग्रामीण जमीन से जुड़ा प्रतिनिधित्व, ऊपर से प्रदेश और जिला संगठन की सहमति। इसमें महिपाल ढांढा की मौजूदगी सरकार का वजन देती है, संदीप जोशी स्थानीय संगठन की कड़ी बनते हैं और वेद फुल्ला की भूमिका उस राजनीतिक समन्वय की तरफ संकेत करती है जिसमें अलग-अलग आकांक्षाओं को बिना सार्वजनिक टकराव के एक फैसले तक पहुंचाया गया।लेकिन इस बिसात की अगली चाल निगम कार्यालय में नहीं, गुरुग्राम की सड़कों पर चलेगी। जलभराव, सीवरेज, सफाई, सड़क, पेयजल और बेतरतीब शहरी विस्तार से परेशान नागरिक जातीय समीकरण से ज्यादा परिणाम मांगेंगे। भांगरौला और भांभू यदि प्रतिनिधित्व को काम में बदलते हैं तभी भाजपा इस प्रयोग को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में आगे रख सकेगी।
फिलहाल गुरुग्राम में दो कुर्सियां जरूर भरी गई हैं, लेकिन निगाह दो कुर्सियों से कहीं आगे जाती दिखाई देती है।यादव और जाट प्रभाव वाले ग्रामीण राजनीतिक भूगोल के बीच दलित नेतृत्व को हिस्सेदारी देकर भाजपा अपने सामाजिक आधार में एक और मजबूत कड़ी जोड़ने की कोशिश करती दिख रही है। यदि यह कड़ी जमीन पर जुड़ गई तो इसकी प्रतिध्वनि गुरुग्राम से बाहर उन विधानसभा क्षेत्रों तक भी सुनाई दे सकती है, जहां कुछ प्रतिशत मतों का झुकाव सत्ता का पूरा हिसाब बदल देता है।और शायद वेद फुल्ला की इस बिसात का सबसे बड़ा अर्थ भी यही है—जमीन पर दशकों काम करने वाला संगठनकर्ता केवल अगली कुर्सी नहीं देखता, वह अगली सामाजिक करवट पढ़ने की कोशिश करता है।

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