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39 साल की सरकारी सेवा के बाद अब वैश्विक मंच पर डॉ. गोपाल पाटील!

 


66 वर्ष की उम्र में मानवाधिकारों की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी, ग्लोबल ह्यूमन राइट्स डिफेंस ने बनाया एशिया का डिप्लोमैट और अंतरराष्ट्रीय सलाहकार परिषद का सलाहकार


न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय का दौरा, बांग्लादेशी हिंदू समुदाय के बीच मानवाधिकारों की आवाज उठाई, मोहन भागवत के कार्यक्रम में भी हुए शामिल




डॉ विजय शुक्ल 

लोकल न्यूज ऑफ इंडिया

पुणे/नई दिल्ली। जिंदगी की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि किसी व्यक्ति ने कितने वर्षों तक किस पद पर काम किया, बल्कि इस बात से होती है कि अपने अनुभव, ज्ञान और सामर्थ्य को उसने समाज के लिए कितना उपयोगी बनाया। महाराष्ट्र के पुणे निवासी विद्यावाचस्पति डॉ. भाऊ उर्फ गोपाल राधाबाई किशनराव पाटील की जीवनयात्रा इसी सोच का उदाहरण बनकर सामने आई है। भारत संचार निगम लिमिटेड में 39 वर्षों तक सेवाएं देने और उप महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने 66 वर्ष की उम्र में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के क्षेत्र में नई जिम्मेदारी संभाली है। नीदरलैंड के हेग स्थित ग्लोबल ह्यूमन राइट्स डिफेंस (जीएचआरडी) ने उन्हें एशिया के लिए डिप्लोमैट और अंतरराष्ट्रीय सलाहकार परिषद का सलाहकार नियुक्त किया है।

दूरसंचार और प्रशासन से शुरू हुआ डॉ. पाटील का सफर कानून, योग, आयुर्वेद, शिक्षा और सामाजिक संगठनों से होते हुए अब वैश्विक मानवाधिकारों के क्षेत्र तक पहुंचा है। उनकी यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपने अनुभवों को केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय सरोकारों से जोड़ने का रास्ता चुना।

अगस्त 2026 में उनकी अमेरिका यात्रा इस नई जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण अध्याय बनी। 27 अगस्त को उन्होंने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय का दौरा किया। जीएचआरडी में एशिया से संबंधित जिम्मेदारी संभालने के बाद यह यात्रा उनके लिए विशेष महत्व रखती है। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उनकी उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों, वैश्विक सहयोग और मानवीय गरिमा से जुड़े उनके बढ़ते सरोकारों का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रही।



इसके अगले दिन 28 अगस्त को न्यूयॉर्क में बांग्लादेशी हिंदू समुदाय से जुड़े एक परिवार के आवास पर आयोजित विशेष बैठक में डॉ. पाटील ने 'हिंदू एकता एवं मानवाधिकारों का संरक्षण' विषय पर संबोधन दिया। इस अवसर पर न्यूयॉर्क के इस्कॉन मंदिर से जुड़े प्रभु नित्यानंद किशोर दास, जीएचआरडी से संबद्ध प्रो. चंदन सरकार, न्यूयॉर्क-न्यूजर्सी क्षेत्र के शक्ति दास गुप्ता, सॉफ्टवेयर इंजीनियर विशाल प्राणेश नाथ सहित अनेक सामाजिक और सामुदायिक प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

यह संवाद ऐसे समय में महत्वपूर्ण रहा, जब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और मानवीय अधिकारों को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। बांग्लादेशी हिंदू समुदाय के प्रतिनिधियों के बीच डॉ. पाटील की भागीदारी ने धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक एकजुटता और मानवाधिकार संरक्षण जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा। किसी भी देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा केवल उस समुदाय का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों की वास्तविक स्थिति की कसौटी भी है।

अमेरिका प्रवास के दौरान 29 अगस्त को डॉ. पाटील ने न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित 'यूनिवर्सल ऑननेस' कार्यक्रम में भी भाग लिया। इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की उपस्थिति रही। भारतीय सांस्कृतिक विचारों, सामाजिक समरसता और विश्वबंधुत्व की अवधारणा से जुड़े इस आयोजन में भागीदारी को डॉ. पाटील ने अपने जीवन का महत्वपूर्ण अनुभव बताया।


डॉ. पाटील की अंतरराष्ट्रीय सक्रियता के पीछे लगभग चार दशकों का प्रशासनिक अनुभव और विभिन्न क्षेत्रों में अर्जित शिक्षा भी है। 27 जुलाई 1960 को जन्मे डॉ. पाटील ने वर्ष 2020 में बीएसएनएल के उप महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की। दूरसंचार क्षेत्र में लंबी सेवा के साथ उन्होंने तकनीकी शिक्षा, साइबर कानून और विधि के क्षेत्र में उच्च अध्ययन किया। दूरसंचार एवं साइबर कानून में डॉक्टरेट के अतिरिक्त उन्होंने विज्ञान, इंजीनियरिंग, एलएलएम, सूचना प्रौद्योगिकी, प्राकृतिक चिकित्सा, उर्दू भाषा और एक्यूप्रेशर हीलिंग साइंस जैसे विविध विषयों में शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

आधुनिक तकनीक और भारतीय पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों में समान रुचि रखने वाले डॉ. पाटील ने पुणे के खादीवाले वैद्य से आयुर्वेदिक प्रशिक्षण तथा नासिक के योग विद्याधाम और हरिद्वार के पतंजलि योगपीठ से योग शिक्षक प्रशिक्षण भी प्राप्त किया है। मराठी, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत भाषाओं का ज्ञान रखने वाले डॉ. पाटील ने हाल के वर्षों में जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे आधुनिक विषयों का भी अध्ययन किया है। वह नियमित योग और ध्यान को अपनी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।



सामाजिक और संगठनात्मक जीवन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है। वर्ष 2015 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े डॉ. पाटील ने 2017 में पुणे, 2019 में नागपुर और 2023 में नासिक में संघ के विभिन्न प्रशिक्षण वर्ग पूरे किए। अक्टूबर 2022 से अक्टूबर 2023 तक उन्होंने पूर्णकालिक शताब्दी विस्तारक के रूप में कार्य किया। गट प्रमुख, मुख्य शिक्षक, कार्यवाह और संपर्क विभाग में विभिन्न दायित्व निभाने के बाद वर्तमान में वह पुणे के सदाशिव पेठ स्थित संताजी प्रभात शाखा के कार्यवाह तथा कसबा भाग में सामाजिक संस्था एवं सामाजिक नेतृत्व श्रेणी प्रमुख के रूप में सक्रिय हैं।

उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने सरकारी सेवा के दौरान अर्जित प्रशासनिक अनुशासन को सामाजिक कार्यों से जोड़ा। योग, प्राकृतिक चिकित्सा, विधिक अध्ययन और सामाजिक संगठनों के माध्यम से वह लगातार सक्रिय रहे। उनके अनुसार, पिछले छह वर्षों से प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में 66 मिनट ध्यान करना उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा है।

2 सितंबर 2026 को अमेरिका यात्रा पूरी कर भारत लौटे डॉ. गोपाल किशनराव पाटील ने मानवाधिकारों, मानवीय गरिमा, न्याय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। जीएचआरडी में मिली नई जिम्मेदारी उनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न समुदायों के बीच संवाद, सामाजिक सद्भाव और अधिकारों के संरक्षण की दिशा में काम करने का अवसर लेकर आई है।

हालांकि किसी भी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी की वास्तविक सार्थकता उसके माध्यम से किए जाने वाले कार्यों में होती है। मानवाधिकारों की रक्षा केवल सम्मेलनों, बैठकों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रह सकती। इसका वास्तविक उद्देश्य उन लोगों तक न्याय और सुरक्षा की आवाज पहुंचाना है, जो सामाजिक, धार्मिक या राजनीतिक परिस्थितियों के कारण अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। डॉ. पाटील के सामने भी अब अपने लंबे प्रशासनिक और सामाजिक अनुभव को इस दिशा में सार्थक बनाने का अवसर है।

भारतीय समाज में सेवानिवृत्ति को अक्सर सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे अलग होने का समय माना जाता है, लेकिन डॉ. पाटील ने इस धारणा से अलग रास्ता चुना है। एक सरकारी अधिकारी के रूप में 39 वर्षों की सेवा, कानून और तकनीक का अध्ययन, भारतीय ज्ञान परंपराओं से जुड़ाव, सामाजिक संगठनों में सक्रिय भागीदारी और अब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों की जिम्मेदारी—उनकी यात्रा जीवन के विभिन्न अनुभवों को एक व्यापक उद्देश्य से जोड़ती दिखाई देती है।

पुणे की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमि से निकलकर भारत की दूरसंचार व्यवस्था में चार दशक बिताने वाले डॉ. गोपाल किशनराव पाटील का अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के मंच तक पहुंचना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस सोच का उदाहरण है जिसमें सेवा के लिए उम्र नहीं, संकल्प महत्वपूर्ण होता है। उनकी जीवनयात्रा यह संदेश देती है कि सरकारी पद से सेवानिवृत्ति हो सकती है, लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदारी और कुछ नया करने की इच्छाशक्ति कभी सेवानिवृत्त नहीं होती।

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